प्रथम संस्करण:-
पुस्तकें सूचनाओं के आदान-प्रदान का बहुत महत्वपूर्ण माध्यम है ।
पुस्तकों से जीवन रूपी समुद्र की ज्ञान रूपी गंगा में गोते लगाना, अपने आप में अनूठा अनुभव देता है ।
यह पुस्तक समाज के स्वजनों के लिए आदर्श पुस्तक सिद्द होगी क्योंकि इसमें समाज की उत्त्पत्ति से लेकर वर्तमान तक का विवरण बड़े ही सटीक शब्दों में दिया गया है । इस पुस्तक के जरिये आपको पता चलेगा कि किन-किन व्यक्तियों ने समय-समय पर क्या-क्या योगदान दिया ।
इसके अतिरिक्त यह पुस्तक ये भी इंगित करेगी समाज के प्रतिष्ठा के प्रतीक कौन-कौन हैं और समाज कहाँ-कहाँ तथा कैसे-कैसे इस जगत, देश,प्रदेश में फैला हुआ है ।
इस पुस्तक में अंगिरस गोत्री सौभरि ब्राह्मण समाज की वंश परंपरा, गोत्र, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक स्थितियों के बारे में ज्ञात होगा ।
सम्पूर्ण पुस्तक स्वसमाज का सजीव चित्रण करने का पूर्ण प्रयास किया गया है।
सौभरि ब्राह्मण समाज की ये जानकारियां पहले प्रकाशित हुईं पुस्तकों व वेबसाइट पर मिली जानकारी एवं समाज के बुद्धजीवियों से एकत्रित की गयीं हैं ।
समाज हमेशा उन बुद्धजीवियों आभार प्रकट करेगा जिन्होंने अपना कीमती समय निकाल कर इन पुस्तकों व वेबसाइट के माध्यम से स्वसमाज की समय-समय पर जानकारी देते रहे ।
इनके बारे में स्वजातीय बंधुओं को इतना ही जानना आवश्यक है जितना इन्होंने अपनी ‘स्वजातीय जानकारियाँ’ निश्वार्थ भाव से दी ।
जिसको ना निज गौरव व निज जाति पर अभिमान है । वह नर नहीं नरपशु निरा है और मृतक समान है ।।
घटनाक्रम के तहत हमने एक कथानुसार रूपरेखा तैयार की है जो कि इस प्रकार है ।
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गणेश जी व सरस्वती जी की स्तुति-
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ब्रह्मा की उत्पत्ति जल में उत्पन्न कमल पर हुई। ब्रह्मा हिन्दू धर्म में एक प्रमुख देवता हैं। ये हिन्दुओं के तीन प्रमुख देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में से एक हैं। ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है।
ब्रह्मा के हाथों में वेद ग्रंथों का चित्रण किया गया है। उनकी पत्नीं गायत्री के हाथों में भी वेद ग्रंथ है।
ब्रह्माजी देवता, दानव तथा सभी जीवों के पितामह हैं। सभी देवता ब्रह्माजी के पौत्र माने गए हैं, अत: वे पितामह के नाम से प्रसिद्ध हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। वे अपने चार हाथों में क्रमश: वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, वेद तथा कमण्डलु धारण किए हैं।
ब्रह्मा जी के पुत्र:- 1. मरीचि 2. अत्रि 3. अंगिरस 4. पुलस्त्य 5. पुलह 6. कृतु 7. भृगु 8. वशिष्ठ 9. दक्ष 10. कर्दम 11. नारद 12. सनक 13. सनन्दन 14. सनातन 15. सनतकुमार 16. स्वायम्भुव मनु और शतरुपा 17. चित्रगुप्त 18. रुचि 19. प्रचेता 20. अंगिरा
ब्रह्मा की प्रमुख पुत्रियां:- 1. सावित्री 2. गायत्री 3. श्रद्धा 4. मेधा 5. सरस्वती
ब्रह्मा के प्रमुख पुत्रों की जन्म की अवस्था:-
1. मन से मारिचि।
2. नेत्र से अत्रि।
3. मुख से अंगिरस।
4. कान से पुलस्त्य।
5. नाभि से पुलह।
6. हाथ से कृतु।
7. त्वचा से भृगु।
8. प्राण से वशिष्ठ।
9. अंगुष्ठ से दक्ष।
10. छाया से कंदर्भ।
11. गोद से नारद।
12. इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार।
13. शरीर से स्वायंभुव मनु और शतरुपा।
14. ध्यान से चित्रगुप्त।
उपरोक्त सभी पुत्रों के ही वंशज आज भारत में निवास करते हैं।
सप्तर्षि- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, कर्तु, पुलस्त्य तथा वशिष्ठ-ये सात ब्रह्माजी के पुत्र उत्तर दिशा में स्थित है, जो स्वायम्भुव मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं।
ब्राह्मण अपने जीवनकाल में सोलह प्रमुख संस्कार करते हैं। जन्म से पूर्व 1-गर्भधारण, 2-पुन्सवन (गर्भ में नर बालक को ईश्वर को समर्पित करना), 3-सिमन्तोणणयन (गर्भिणी स्त्री का केश-मुण्डन), बाल्यकाल में 4-जातकर्म (जन्मानुष्ठान), 5-नामकरण, 6-निष्क्रमण, 7-अन्नप्रासन, 8- चूडकर्ण, 9- कर्णवेध, बालक के शिक्षण-काल में 10-विद्यारम्भ, 11-उपनयन अर्थात यज्ञोपवीत्, 12-वेदारम्भ, 13-केशान्त अथवा गोदान, तथा 14-समवर्तनम् या स्नान (शिक्षा-काल का अन्त)। वयस्क होने पर 15-विवाह तथा मृत्यु पश्चात 16-अन्त्येष्टि प्रमुख संस्कार हैं।
ब्राह्मण सिर्फ मंदिर में पूजा करता हुआ पुजारी नहीं है,
ब्राह्मण घर-घर भीख मांगता भिखारी नहीं है।
ब्राह्मण गरीबी में सुदामा-सा सरल है,
ब्राह्मण त्याग में दधीचि-सा विरल है।
ब्राह्मण विषधरों के शहर में शंकर के समान है,
ब्राह्मण के हस्त में शत्रुओं के लिए परशु कीर्तिवान है ।
न क्रुद्ध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः । सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥
भावार्थ: जो व्यक्ति सम्मान दिए जाने अथवा अपमान किये जाने पर न तो प्रसन्न होता है और न ही नाखुश, और जो सभी प्राणियों अभय देता है उसी को देवतागण ब्राह्मण कहते हैं ।
ब्राह्मण शब्द पहले ज्ञान साधना, शील, सदाचार, त्याग और आध्यात्मिक जीवन-वृत्ति के आधार पर अपना जीवन जीने वाले लोगों के लिए एक सम्मानित संबोधन है ।
देवाधीनाजगत्सर्वं मन्त्राधीनाश्च देवता: ।
ते मन्त्रा: ब्राह्मणाधीना:तस्माद् ब्राह्मण देवता ।
भावार्थ:- सारा संसार देवताओं के अधीन है तथा देवता मन्त्रों के अधीन हैं और मन्त्र ब्राह्मण के अधीन हैं इस कारण ब्राह्मण देवता हैं ।
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Angira ji-

पुराणों में बताया गया है कि महर्षि अंगिरा ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं तथा ये गुणों में ब्रह्मा जी के ही समान हैं। इन्हें प्रजापति भी कहा गया है और सप्तर्षियों में वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा मरीचि आदि के साथ इनका भी परिगणन हुआ है। इनके दिव्य अध्यात्मज्ञान, योगबल, तप-साधना एवं मन्त्रशक्ति की विशेष प्रतिष्ठा है। इनकी पत्नी दक्ष प्रजापति की पुत्री स्मृति (मतान्तर से श्रद्धा) थीं, जिनसे इनके वंश का विस्तार हुआ। इनके पुत्र घोर ऋषि और इनके पौत्र कण्व तथा इनके प्रपौत्र ब्रह्म्रिश सौभरि जी हैं |ऋग्वेद की विनियोग परंपरा तथा आर्षानुक्रमणी से ज्ञात होता है कि ब्रह्मा से अंगिरा, अंगिरा से घोर, घोर से कण्व और कण्व से सौभरि हुए।
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इनकी तपस्या और उपासना इतनी तीव्र थी कि इनका तेज और प्रभाव अग्नि की अपेक्षा बहुत अधिक बढ़ गया। उस समय अग्निदेव भी जल में रहकर तपस्या कर रहे थे। जब उन्होंने देखा कि अंगिरा के तपोबल के सामने मेरी तपस्या और प्रतिष्ठा तुच्छ हो रही है तो वे दु:खी हो अंगिरा के पास गये और कहने लगे- ‘आप प्रथम अग्नि हैं, मैं आपके तेज़ की तुलना में अपेक्षाकृत न्यून होने से द्वितीय अग्नि हूँ। मेरा तेज़ आपके सामने फीका पड़ गया है, अब मुझे कोई अग्नि नहीं कहेगा।’ तब महर्षि अंगिरा ने सम्मानपूर्वक उन्हें देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य सौंपा। साथ ही पुत्र रूप में अग्नि का वरण किया। तत्पश्चात वे अग्नि देव ही बृहस्पति नाम से अंगिरा के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हुए। उतथ्य तथा महर्षि संवर्त भी इन्हीं के पुत्र हैं। महर्षि अंगिरा की विशेष महिमा है। ये मन्त्रद्रष्टा, योगी, संत तथा महान भक्त हैं। इनकी ‘अंगिरा-स्मृति’ में सुन्दर उपदेश तथा धर्माचरण की शिक्षा व्याप्त है।
सम्पूर्ण ऋग्वेद में महर्षि अंगिरा तथा उनके वंशधरों तथा शिष्य-प्रशिष्यों का जितना उल्लेख है, उतना अन्य किसी ऋषि के सम्बन्ध में नहीं हैं। विद्वानों का यह अभिमत है कि महर्षि अंगिरा से सम्बन्धित वेश और गोत्रकार ऋषि ऋग्वेद के नवम मण्डल के द्रष्टा हैं। नवम मण्डल के साथ ही ये अंगिरस ऋषि प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि अनेक मण्डलों के तथा कतिपय सूक्तों के द्रष्टा ऋषि हैं। जिनमें से महर्षि कुत्स, हिरण्यस्तूप, सप्तगु, नृमेध, शंकपूत, प्रियमेध, सिन्धुसित, वीतहव्य, अभीवर्त, अंगिरस, संवर्त तथा हविर्धान आदि मुख्य हैं।
ऋग्वेद का नवम मण्डल जो 114 सूक्तों में निबद्ध हैं, ‘पवमान-मण्डल’ के नाम से विख्यात है। इसकी ऋचाएँ पावमानी ऋचाएँ कहलाती हैं। इन ऋचाओं में सोम देवता की महिमापरक स्तुतियाँ हैं, जिनमें यह बताया गया है कि इन पावमानी ऋचाओं के पाठ से सोम देवताओं का आप्यायन होता है।
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु: समलक्षणम्॥ -मनु (1/13)
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और (तु अर्थात) अंगिरा से ऋग, यजु, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।
इन्होंने वेदों की ऋचाओं के साथ ही अपने नाम से अंगिरा स्मृति की रचना की।
अंगिरा-स्मृति : अंगिरा-स्मृति में सुन्दर उपदेश तथा धर्माचरण की शिक्षा व्याप्त है। अंगिरा स्मृति के अनुसार बिना कुशा के धर्मानुष्ठान, बिना जल स्पर्श के दान, संकल्प; बिना माला के संख्याहीन जाप, ये सब निष्फल होते हैं।
उत्पत्ति– अंगिरस शब्द का निर्माण उसी धातु से हुआ है, जिससे अग्नि का और एक मत से इनकी उत्पत्ति भी आग्नेयी (अग्नि की कन्या) के गर्भ से मानी जाती है। मतांतर से इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से मानी जाती है। श्रद्धा, शिवा, सुरूपा मारीची एवं दक्ष की स्मृति, स्वधा तथा सती नामक कन्याएँ इसकी पत्नियाँ मानी जाती हैं, परंतु ब्रह्मांड एवं वायु पुराणों में सुरूपा मारीची, स्वराट् कार्दमी और पथ्या मानवी को अथर्वन की पत्नियाँ कहा गया है। अथर्ववेद के प्रारंभकर्ता होने के कारण इनकी अथर्वा भी कहते हैं।
मनुस्मृति के अनुसार-
मनुस्मृति में भी यह कथा है कि आंगिरस नामक एक ऋषि को छोटी अवस्था में ही बहुत ज्ञान हो गया था; इसलिए उसके काका–मामा आदि बड़े बूढ़े नातीदार उसके पास अध्ययन करने लग गए थे। एक दिन पाठ पढ़ाते–पढ़ाते आंगिरस ने कहा पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान्। बस, यह सुनकर सब वृद्धजन क्रोध से लाल हो गए और कहने लगे कि यह लड़का मस्त हो गया है! उसको उचित दण्ड दिलाने के लिए उन लोगों ने देवताओं से शिकायत की। देवताओं ने दोनों ओर का कहना सुन लिया और यह निर्णय लिया कि ‘आंगिरस ने जो कुछ तुम्हें कहा, वही न्याय है।’ इसका कारण यह है कि–
न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।
यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः।।
‘सिर के बाल सफ़ेद हो जाने से ही कोई मनुष्य वृद्ध नहीं कहा जा सकता; देवगण उसी को वृद्ध कहते हैं जो तरुण होने पर भी ज्ञानवान हो’
स्वायंभुव मन्वंतर- स्वायंभुव मन्वंतर में अंगिरा को ब्रह्मा के सिर से उत्पन्न बताया गया है। दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री स्मृति का इनसे विवाह किया था। वैवस्वत मन्वंतर में ये शंकर के वरदान से उत्पन्न हुए और अग्नि ने अपने पुत्र के समान इनका पालन-पोषण किया। चाक्षुष मन्वंतर में दक्ष प्रजापति की कन्याएँ सती और स्वधा इनकी पत्नियाँ थीं। भागवत में स्यमंतक मणि की चोरी के प्रसंग में इनके श्री कृष्ण से मिलने का भी उल्लेख आया है। शर-शैया पर पड़े भीष्म पितामह के दर्शनों के लिए भी अपने शिष्यों के साथ गए थे। स्मृतिकारों ने अंगिरस के धर्मशास्त्र का उल्लेख किया है। महाभारत में भी ‘अंगिरस स्मृति’ का उल्लेख मिलता है। उपनिषद में इनको ब्रह्मा का ज्येष्ठ पुत्र बताया गया है, जिन्हें ब्रह्म विद्या प्राप्त हुई। शौनक को इन्होंने विद्या के दो रूपों परा (वेद, व्याकरण आदि का ज्ञान) तथा अपरा (अक्षर का ज्ञान) से परिचित कराया था। इस प्रकार ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में एक नाम का उल्लेख सिद्ध करता है कि इस नाम की या तो कोई वंश परम्परा थी या कोई गद्दी। इनका कुल जिसमें भारद्वाज और गौतम भी हुए, ‘आग्नेय’ नाम से प्रसिद्ध था।
जीवनसार- अथर्ववेद का प्राचीन नाम अथर्वानिरस है। इनके पुत्रों के नाम हविष्यत्, उतथ्य, बृहस्पति, बृहत्कीर्ति, बृहज्ज्योति, बृहद्ब्रह्मन् बृहत्मंत्र; बृहद्भास, मार्कंडेय और संवर्त बताए गए हैं और भानुमती, रागा (राका), सिनी वाली, अर्चिष्मती (हविष्मती), महिष्मती, महामती तथा एकानेका (कुहू) इनकी सात कन्याओं के भी उल्लेख मिलते हैं। नीलकंठ के मत से उपर्युक्त बृहत्कीत्यादि सब बृहस्पति के विशेषण हैं। आत्मा, आयु, ऋतु, गविष्ठ, दक्ष, दमन, प्राण, सद, सत्य तथा हविष्मान् इत्यादि को अंगिरस के देवपुत्रों की संज्ञा से अभिहित किया गया है। भागवत के अनुसार रथीतर नामक किसी निस्संतान क्षत्रिय को पत्नी से इन्होंने ब्राह्मणोपम पुत्र उत्पन्न किए थे। याज्ञवल्क्य स्मृति में अंगिरसकृत धर्मशास्त्र का भी उल्लेख है। अंगिरा की बनाई आंगिरसी श्रुति का महाभारत में उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों के ऋषि अंगिरा हैं।
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घोर ऋषि-

घोर ऋषि ब्रह्माजी के पौत्र व अंगिरा जी के पुत्र हैं । भगवत पुराण एवं विष्णु पुराण में इनका वंश विवरण मिलता है । घोर ऋषि जी के पुत्र कण्व ऋषि थे जिन्होंने चक्रवर्ती सम्राट भरत को अपने आश्रम में पाला था । कण्वऋषि से भी एक पुत्र हुए जिनका नाम ब्रह्मऋषि सौभरि जी हैं जिनकी वंशावली ” आदिगौड़ सौभरेय ब्राह्मण” कहलाती है ।
जो कि यमुना नदी के आसपास बसा सुनरख गाँव, इनका मूल निवास रहा है ।
विष्णु पुराण व भागवद पुराण में इनके उल्लेख मिलता है ।
घोर ऋषि भी संदीपनी मुनि की तरह श्रीकृष्ण के गुरु रहे हैं । इनमें भी अंगिरा ऋषि की तरह अग्नि जैसा तेज था । इनको इनके पिता के नाम की वजह से “घोर आंगिरस” की संज्ञा दी गयी ।

कण्व वैदिक काल के विख्यात ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का लालन पालन हुआ था। सोनभद्र में जिला मुख्यालय से आठ किलो मीटर की दूरी पर कैमूर शृंखला के शीर्ष स्थल पर स्थित कण्व ऋषि की तपस्थली है जो कंडाकोट नाम से जानी जाती है।कण्व ऋषी आश्रम, हरिद्वार से लगभग 42 किमी की दूरी पर मालिनी नदी के किनारे स्थित है। हरे भरे जंगलों के बीच स्थित यह स्थान प्रकृति प्रेमियों एवं शांति प्रेमियों के लिए स्वर्ग के समान है।
इनके पुत्र घोर ऋषि और इनके पौत्र कण्व तथा इनके प्रपौत्र ब्रह्मर्षि सौभरि जी हैं |ऋग्वेद की विनियोग परंपरा तथा आर्षानुक्रमणी से ज्ञात होता है कि ब्रह्मा से अंगिरा, अंगिरा से घोर, घोर से कण्व और कण्व से सौभरि हुए।
1- एक मंत्रकार ऋषि जिनके बहुत से मंत्र ऋग्वेद में हैं ।
२- शुक्ल यजुर्वेद के एक शाखाकर ऋषि । इनकी संहिता भी है और ब्राह्मण भी । सायणाचार्य ने इन्हीं की संहिता पर भाष्य किया है ।
३- कण्व वैदिक काल के विख्यात ऋषि जिन्होंने शकुंतला को पाला था ।
प्राचीन भारत में ‘कण्व’ नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं, जिनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध महर्षि कण्व थे, जिन्होंने अप्सरा मेनका के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र की कन्या शकुंतला को पाला था। देवी शकुन्तला के धर्मपिता के रूप में महर्षि कण्व की अत्यन्त प्रसिद्धि है।
महाकवि कालिदास ने अपने ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में महर्षि के तपोवन, उनके आश्रम-प्रदेश तथा उनका, जो धर्माचारपरायण उज्ज्वल एवं उदात्त चरित प्रस्तुत किया है, वह अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता। उनके मुख से एक भारतीय कथा के लिये विवाह के समय जो शिक्षा निकली है, वह उत्तम गृहिणी का आदर्श बन गयी। महर्षि कण्व शकुन्तला की विदाई के समय कहते हैं-
“शुश्रुषस्व गुरुन् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीज ने पत्युर्विप्रकृताऽपि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गम:। भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामा: कुलस्याधय:॥”
103 सूक्त वाले ऋग्वेद के आठवें मण्डल के अधिकांश मन्त्र महर्षि कण्व तथा उनके वंशजों तथा गोत्रजों द्वारा दृष्ट हैं। कुछ सूक्तों के अन्य भी द्रष्ट ऋषि हैं, किंतु ‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति’ के अनुसार महर्षि कण्व अष्टम मण्डल के द्रष्टा ऋषि कहे गये हैं।
ऋग्वेद के साथ ही शुक्ल यजुर्वेद की ‘माध्यन्दिन’ तथा ‘काण्व’, इन दो शाखाओं में से द्वितीय ‘काण्वसंहिता’ के वक्ता भी महर्षि कण्व ही हैं। उन्हीं के नाम से इस संहिता का नाम ‘काण्वसंहिता’ हो गया।
ऋग्वेद में इन्हें अतिथि-प्रिय कहा गया है। इनके ऊपर अश्विद्वय की कृपा की बात अनेक जगह आयी है और यह भी बताया गया है कि कण्व-पुत्र तथा इनके वंशधर प्रसिद्ध याज्ञिक थे ]तथा इन्द्र के भक्त थे।
ऋग्वेद के 8वें मण्डल के चौथे सूक्त में कण्व-गोत्रज देवातिथि ऋषि हैं; जिन्होंने सौभाग्यशाली कुरुंग नामक राजा से 60 हज़ार गायें दान में प्राप्त की थीं।
धीभि: सातानि काण्वस्य वाजिन: प्रियमेधैरभिद्युभि:। षष्टिं सहस्त्रानु निर्मजाम जे निर्यूथानि गवामृषि:॥
इस प्रकार ऋग्वेद का अष्टम मण्डल कण्ववंशीय ऋषियों की देवस्तुति में उपनिबद्ध है। महर्षि कण्व ने एक स्मृति की भी रचना की है, जो ‘कण्वस्मृति’ के नाम से विख्यात है।
अष्टम मण्डल में 11 सूक्त ऐसे हैं, जो ‘बालखिल्य सूक्त’ के नाम से विख्यात हैं। देवस्तुतियों के साथ ही इस मण्डल में ऋषि द्वारा दृष्टमन्त्रों में लौकिक ज्ञान-विज्ञान तथा अनिष्ट-निवारण सम्बन्धी उपयोगी मन्त्र भी प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिये ‘यत् इन्द्र मपामहे.'[5] इस मन्त्र का दु:स्वप्र-निवारण तथा कपोलशक्ति के लिये पाठ किया जाता है। सूक्त की महिमा के अनेक मन्त्र इसमें आये हैं।[6] गौ की सुन्दर स्तुति है, जो अत्यन्त प्रसिद्ध है। ऋषि गो-प्रार्थना में उसकी महिमा के विषय में कहते हैं- “गौ रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, अदिति पुत्रों की बहिन और घृतरूप अमृत का ख़ज़ाना है, प्रत्येक विचारशील पुरुष को मैंने यही समझाकर कहा है कि निरपराध एवं अवध्य गौ का वध न करो।
माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि:। प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट॥
एक बार हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत आखेट खेलने वन में गये। जिस वन में वे शिकार के लिये गये थे उसी वन में कण्व ऋषि का आश्रम था। कण्व ऋषि के दर्शन करने के लिये महाराज दुष्यंत उनके आश्रम पहुँच गये। पुकार लगाने पर एक अति लावण्यमयी कन्या ने आश्रम से निकल कर कहा, “हे राजन्! महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये हैं, किन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत है।
उस कन्या को देख कर महाराज दुष्यंत ने पूछा, “बालिके! आप कौन हैं?” बालिका ने कहा, “मेरा नाम शकुन्तला है और मैं कण्व ऋषि की पुत्री हूँ।” उस कन्या की बात सुन कर महाराज दुष्यंत आश्चर्यचकित होकर बोले, “महर्षि तो आजन्म ब्रह्मचारी हैं फिर आप उनकी पुत्री कैसे हईं?” उनके इस प्रश्न के उत्तर में शकुन्तला ने कहा, “वास्तव में मेरे माता-पिता मेनका और विश्वामित्र हैं। मेरी माता ने मेरे जन्म होते ही मुझे वन में छोड़ दिया था जहाँ पर शकुन्त नामक पक्षी ने मेरी रक्षा की। इसी लिये मेरा नाम शकुन्तला पड़ा।
उसके बाद कण्व ऋषि की दृष्टि मुझ पर पड़ी और वे मुझे अपने आश्रम में ले आये। उन्होंने ही मेरा भरन-पोषण किया। जन्म देने वाला, पोषण करने वाला तथा अन्न देने वाला – ये तीनों ही पिता कहे जाते हैं। इस प्रकार कण्व ऋषि मेरे पिता हुये।”
शकुन्तला के वचनों को सुनकर महाराज दुष्यंत ने कहा, “शकुन्तले! तुम क्षत्रिय कन्या हो। तुम्हारे सौन्दर्य को देख कर मैं अपना हृदय तुम्हें अर्पित कर चुका हूँ। यदि तुम्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।” शकुन्तला भी महाराज दुष्यंत पर मोहित हो चुकी थी, अतः उसने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। दोनों नें गन्धर्व विवाह कर लिया। कुछ काल महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला के साथ विहार करते हुये वन में ही व्यतीत किया। फिर एक दिन वे शकुन्तला से बोले, “प्रियतमे! मुझे अब अपना राजकार्य देखने के लिये हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। महर्षि कण्व के तीर्थ यात्रा से लौट आने पर मैं तुम्हें यहाँ से विदा करा कर अपने राजभवन में ले जाउँगा।” इतना कहकर महाराज ने शकुन्तला को अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपनी स्वर्ण मुद्रिका दी और हस्तिनापुर चले गये।
एक दिन उसके आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे। महाराज दुष्यंत के विरह में लीन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान भी नहीं हुआ और उसने दुर्वासा ऋषि का यथोचित स्वागत सत्कार नहीं किया। दुर्वासा ऋषि ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित हो कर बोले, “बालिके! मैं तुझे शाप देता हूँ कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा निरादर किया है, वह तुझे भूल जायेगा।” दुर्वासा ऋषि के शाप को सुन कर शकुन्तला का ध्यान टूटा और वह उनके चरणों में गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगी। शकुन्तला के क्षमा प्रार्थना से द्रवित हो कर दुर्वासा ऋषि ने कहा, “अच्छा यदि तेरे पास उसका कोई प्रेम चिन्ह होगा तो उस चिन्ह को देख उसे तेरी स्मृति हो आयेगी।”
महाराज दुष्यंत के सहवास से शकुन्तला गर्भवती हो गई थी। कुछ काल पश्चात् कण्व ऋषि तीर्थ यात्रा से लौटे तब शकुन्तला ने उन्हें महाराज दुष्यंत के साथ अपने गन्धर्व विवाह के विषय में बताया। इस पर महर्षि कण्व ने कहा, “पुत्री! विवाहित कन्या का पिता के घर में रहना उचित नहीं है। अब तेरे पति का घर ही तेरा घर है।” इतना कह कर महर्षि ने शकुन्तला को अपने शिष्यों के साथ हस्तिनापुर भिजवा दिया। मार्ग में एक सरोवर में आचमन करते समय महाराज दुष्यंत की दी हुई शकुन्तला की अँगूठी, जो कि प्रेम चिन्ह थी, सरोवर में ही गिर गई। उस अँगूठी को एक मछली निगल गई।
महाराज दुष्यंत के पास पहुँच कर कण्व ऋषि के शिष्यों ने शकुन्तला को उनके सामने खड़ी कर के कहा, “महाराज! शकुन्तला आपकी पत्नी है, आप इसे स्वीकार करें।” महाराज तो दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला को विस्मृत कर चुके थे। अतः उन्होंने शकुन्तला को स्वीकार नहीं किया और उस पर कुलटा होने का लाँछन लगाने लगे। शकुन्तला का अपमान होते ही आकाश में जोरों की बिजली कड़क उठी और सब के सामने उसकी माता मेनका उसे उठा ले गई।
जिस मछली ने शकुन्तला की अँगूठी को निगल लिया था, एक दिन वह एक मछुआरे के जाल में आ फँसी। जब मछुआरे ने उसे काटा तो उसके पेट अँगूठी निकली। मछुआरे ने उस अँगूठी को महाराज दुष्यंत के पास भेंट के रूप में भेज दिया। अँगूठी को देखते ही महाराज को शकुन्तला का स्मरण हो आया और वे अपने कृत्य पर पश्चाताप करने लगे। महाराज ने शकुन्तला को बहुत ढुँढवाया किन्तु उसका पता नहीं चला।
कुछ दिनों के बाद देवराज इन्द्र के निमन्त्रण पाकर देवासुर संग्राम में उनकी सहायता करने के लिये महाराज दुष्यंत इन्द्र की नगरी अमरावती गये। संग्राम में विजय प्राप्त करने के पश्चात् जब वे आकाश मार्ग से हस्तिनापुर लौट रहे थे तो मार्ग में उन्हें कश्यप ऋषि का आश्रम दृष्टिगत हुआ। उनके दर्शनों के लिये वे वहाँ रुक गये। आश्रम में एक सुन्दर बालक एक भयंकर सिंह के साथ खेल रहा था। मेनका ने शकुन्तला को कश्यप ऋषि के पास लाकर छोड़ा था तथा वह बालक शकुन्तला का ही पुत्र था। उस बालक को देख कर महाराज के हृदय में प्रेम की भावना उमड़ पड़ी। वे उसे गोद में उठाने के लिये आगे बढ़े तो शकुन्तला की सखी चिल्ला उठी, “हे भद्र पुरुष! आप इस बालक को न छुयें अन्यथा उसकी भुजा में बँधा काला डोरा साँप बन कर आपको डस लेगा।” यह सुन कर भी दुष्यंत स्वयं को न रोक सके और बालक को अपने गोद में उठा लिया। अब सखी ने आश्चर्य से देखा कि बालक के भुजा में बँधा काला गंडा पृथ्वी पर गिर गया है। सखी को ज्ञात था कि बालक को जब कभी भी उसका पिता अपने गोद में लेगा वह काला डोरा पृथ्वी पर गिर जायेगा। सखी ने प्रसन्न हो कर समस्त वृतान्त शकुन्तला को सुनाया। शकुन्तला महाराज दुष्यंत के पास आई। महाराज ने शकुन्तला को पहचान लिया। उन्होंने अपने कृत्य के लिये शकुन्तला से क्षमा प्रार्थना किया और कश्यप ऋषि की आज्ञा लेकर उसे अपने पुत्र सहित अपने साथ हस्तिनापुर ले आये।
महाराज दुष्यंत और शकुन्तला के उस पुत्र का नाम भरत था। बाद में वे भरत महान प्रतापी सम्राट बने और उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष हुआ।
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ब्रह्मऋषि सौभरि-

आपको मैं ब्रह्मा के मानस पुत्र अंगिरा और अंगिरा के घोर और घोर के कण्व और कण्व ऋषि के वंश में उत्पन्न एक अत्यन्त विद्वान एवं तेजस्वी महापुरुष “ब्रह्मऋषि सौभरि” के बारे में बताने जा रहा हूँ । उन्होंने वेद-वेदांगों के अध्ययन-मनन से ईश्वर, संसार एवं इसकी वस्तुएँ तथा परमार्थ को अच्छी तरह समझ लिया था। वो हर समय अध्ययन एवं ईश्वर के भजन में लगे रहते थे, उनका मन संसार की अन्य किसी वस्तु में नहीं लगता था। एक बार उनके मन में ये इच्छा उत्पन्न हुई कि वन में जाकर तपस्या की जाये; जब उनके माता-पिता को इसके बारे में पता चला, तो उन्होंने सौभरि को समझाते हुये कहा,
“बेटे! इस समय तुम युवा हो, तुम्हें अपना विवाह कर गृहस्थ-धर्म का पालन करना चाहिए। चूँकि हर वस्तु उचित समय पर ही अच्छी लगती है, इसलिए पहले अपनी जिम्मेदारियों को निभाओ, फ़िर उनसे मुक्त होकर, संसार को त्यागकर भगवान का भजन करना; उस समय तुम्हें कोई नहीं रोकेगा। हालांकि अभी तुम्हारा मन वैराग्य की ओर है, परन्तु युवावस्था में मन चंचल होता है, जरा में डिग जाता है। इस प्रकार अस्थिर चित्त से तुम तपस्या एवं साधना कैसे करोगे?”
लेकिन सौभरि तो जैसे दृढ़-निश्चय कर चुके थे। उनके माता-पिता की कोई भी बात उन्हें टस से मस ना कर सकी और एक दिन वे सत्य की खोज में वन की ओर निकल पड़े। चलते-२ वे एक अत्यन्त ही सुन्दर एवं रमणीय स्थान पर पहुँचे; जहाँ पास ही नदी बह रही थी और पक्षी मधुर स्वर में कलरव कर रहे थे। इस स्थान को उन्होंने अपनी तपस्या-स्थली के रूप में चुना।
ऐसे ही दिन बीत रहे थे, उनके शरीर पर अब किसी भी मौसम का असर नहीं होता था। गाँव वाले जो कुछ रूखा-सूखा दे जाते, उसी से वो अपना पेट भर लेते थे। धीरे-२ कब जवानी बीत गई और कब बुढ़ापे ने उन पर अपना असर दिखाना शुरु कर दिया, पता ही नहीं चला। फ़िर एक दिन अचानक वो हो गया, जो नहीं होना चाहिए था।
एक समय की बात है…
सम्राट मान्धातृ अथवा मांधाता, इक्ष्वाकुवंशीय नरेश युवनाश्व और गौरी पुत्र अयोध्या में राज्य किया करते थे |
वह सौ राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों के कर्ता और दानवीर, धर्मात्मा चक्रवर्ती सम्राट् थे |
मान्धाता ने शशबिंदु की पुत्री बिन्दुमती से विवाह किया |उनके मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और 50 कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं।
राजा मान्धाता ‘युवनाश्व’ के पुत्र थे | युवनाश्व च्यवन ऋषि द्वारा संतानोंत्पति के लिए मंत्र-पूत जल का कलश पी गए थे | च्यवन ऋषि ने राजा से कहा कि अब आपकी कोख से बालक जन्म लेगा। सौ वर्षो के बाद अश्विनीकुमारों ने राजा की बायीं कोख फाड़कर बालक को निकाला। अब बालक को पालना, एक बड़ी समस्या थी, तो तभी इन्द्रदेव ने अपनी तर्जनी अंगुली उसे चुसाते हुए कहा- माम् अयं धाता (यह मुझे ही पीयेगा)। इसी से बालक का नाम मांधाता पड़ा। उन्ही के समय में ब्रह्मऋषि सौभरि जी नामक महर्षि जल के अंदर तप व् चिंतन करते थे | उस जल में ‘संवद’ नामक मत्स्य निवास करता था | वह अपने परिवार के साथ जल में विहार करता रहता था | एक दिन ब्रह्मऋषि सौभरि जी ने तस्य से निवृत होकर उस मत्स्य राज को उसके परिवार सहित देखकर अपने अंदर विचार किया किया और सोचा की यह मछली की योनि में भी अपने परिवार के साथ रमण कर रहा है क्यों न मैं भी इसी तरह से अपने परिवार के साथ ललित क्रीड़ाएं किया करूँगा | और उसी समय जल से निकल कर गृहस्थ जीवन जीने की अभिलाषा से राजा मान्धाता के पास पहुँच गए | अचानक आये हुए महर्षि को देखकर राजा मान्धाता आश्चर्यचकित हो गए और बोले हे ब्रह्मऋषि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ | वो मुझे बतलाओ | ब्रह्मऋषि सौभरि जी ने आसान ग्रहण करते हुए राजा मान्धाता से बोले हे राजन ! मुझे आपकी एक कन्या की आवश्यकता है जिससे मैं विवाह रचाना चाहता हूँ | आपके समान अन्य राजाओं की पुत्रियां भी हैं परन्तु मैं यहाँ इसलिए आया हूँ की कोई भी याचक आपके यहाँ से खाली हाथ कभी नहीं लौटा है | आपके तो 50 कन्याएं हैं उनमें से आप मुझे सिर्फ एक ही दे दीजिये | राजा ने महर्षि की बातें सुन व् उनके बूढ़े शरीर को देखकर डरते हुए बोले हे ब्रह्मऋषि ! आपकी यह इच्छा हमारे मन से परे है क्यूंकि हमारे कुल में लड़कियाँ अपना वर स्वयं चुनती हैं | ब्रह्मऋषि सौभरि सोचने लगे ये बात सिर्फ टालने के लिए है और वह यह भी सोच रहे थे की ये राजा मेरे जर्जर शरीर को देखकर भयाभय हो रहे हैं | राजा की ऐसी मनोदशा देखकर वह बोले हे राजन ! अगर आपकी पुत्री मुझे चाहेगी तो ही मैं विवाह करूँगा अन्यथा नहीं | यह सुनकर राजा मान्धाता बोले फिर तो आप स्वयं अंतःपुर को चलिए, अंतःपुर में प्रवेश से पहले ही ब्रह्मऋषि सौभरि जी ने अपने तपोबल से गंधर्वों से भी सुन्दर और सुडौल शरीर धारण कर लिया | ब्रह्मऋषि के साथ अंतःपुर रक्षयक था और उससे महर्षि ने कहा की अब वह राजा की पुत्रियाँ से बोले, जो कोई पुत्रि मुझे वर के रूप में स्वीकार करती हो वो मेरा स्मरण करे इतना सुनते ही राजा की सभी पुत्रियों ने आपने-अपने मन महर्षि का स्मरण किया और परस्पर यह कहने लगी ये आपके अनुरूप नहीं हैं इसलिए मैं ही इनके साथ विवाह करुँगी | देखते -देखते राजा की पुत्रियां आपस में कलह करने लगी | ये सारी बातें अंतःपुर रक्षयक ने राजा मान्धाता को बताई | यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और बोले रक्षयक तुम कैसी बात कर रहे हो | राजा पश्चाताप करने लगे की मैं उन्हें अंदर जाने दिया | जैसे तैसे न चाहते हुए भी राजा ने विवाह संस्कार पूरा किया और और वहाँ से पचासों पुत्रियों के साथ से विदा किया | ब्रह्मऋषि सौभरि जी उन पचासों कन्यांओं को अपने आश्रम को ले गए | आश्रम पहुंचते ही विश्वकर्मा को बुलाया और सभी कन्यांओं के लिए अलग-अलग गृह बनाने के लिए बोला | और चारों तरफ सुन्दर जलाशय और पक्षियों से गूंजते हुए बगीचे हों | शिल्प विद्या के धनी विश्वकर्मा ने वह सारी सुविधाएं उपलब्ध करायीं जो की अनिवार्य थीं | राज कन्याओं के लिए अलग-अलग महल खड़े कर दिए | अब राज कन्यांएं बड़े मधर स्वभाव से वहाँ रमण करने लगीं | एकदिन राजा ने अपनी पुत्रिओं का हाल जानने के लिए महर्षि के श्रम पहुंचे और वहाँ जाकर अपनी पुत्रियों से एक-एक करs वहाँ का हाल-चाल पूछा और कहा की खुश पुत्री तो है ना? तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट तो नहीं है | पुत्री ने जवाब दिया, नहीं मैं बहुत खुश है | बस एक बात है की ब्रह्मऋषि सौभरि जी मुझे छोड़कर अन्य बहनों के पास जाते ही नहीं | इसी तरह राजा ने दूसरी पुत्री से भी वही प्रश्न किया उसने भी पहली वाली पुत्री की तरह जवाब दिया | इसी तरह से राजा मान्धाता को सभी पुत्रियों से समान उत्तर सुनने को मिला | राजा सब कुछ समझ गए और ब्रह्मऋषि सौभरि जी के सामने हाथ जोड़कर बोले महर्षि ये आपके तपोबल का ही परिणाम है | अंत में राजा अपने राज्य को लौट आये | महृषि सौभरि जी के 5000 पुत्र हुए कई वर्षों तक ऋषि सौभरि जी ने अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते रहे | और वह आगे सोचने लगे की अब उनके पुत्रों के भी पुत्र होंगे, अंदर ही अंदर विचार करने लगे की मेरी इच्छाओं के मनोरथ का विस्तार होता जा रहा है | ये सब सोचकर फिर से उन्हें वैराग्य होने लगा | फ़िर धीरे-२ उनका मन इन सब से उचटने लगा। उनका मन उनसे बार-२ एक ही प्रश्न करता कि क्या इन्हीं सांसारिक भोगों के लिए उन्होंने तपस्या और कल्याण का मार्ग छोड़ा था।। उन्होंने गृहस्थ-जीवन के सुख को भी देखा था और तपस्या के समय की शांति और संतोष को भी। इस प्रकार वह पुत्र मोह व् गृहस्थ सब कुछ त्याग कर अपनी स्त्रियों सहित वन की ओर गमन कर गए | और बाद में भगवान् में आशक्त होकर मोक्ष को प्राप्त किया |
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अंगिरस सौभरि ब्रह्मणों के उपगोत्र- नामकरण शिशु जन्म के बाद पहला संस्कार कहा जा सकता है। कौन-सा शब्द कब बना या किसने बनाया इसका कोई आँकड़ा नहीं पाया जाता । किसी वस्तु, गुण, प्रक्रिया, परिघटना आदि को समझने-समझाने के लिये समुचित नाम देना आवश्यक है इसे ही नामकरण कहते हैं।
16 संस्कारों में नामकरण-संस्कार पंचम संस्कार है। यह संस्कार बालक के जन्म होने के ग्यारहवें दिन होता है । संस्कृत व्याकरण के रचनाकार महर्षि पाणिनि जी द्वारा गोत्र की परिभाषा- ‘अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्’ अर्थात ‘गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक साधु की) संतान्। गोत्र, कुल या वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है। गोत्र को हिन्दू लोग लाखो हजारों वर्ष पहले पैदा हुए पूर्वजों के नाम से ही अपना गोत्र के नाम चले आ रहे हैंं जिससे वैवाहिक जटिलताएं उतपन्न नहींं हो रही हैं और इसलिए वंशपरंपरा का बने रहना अत्यावश्यक है। गोत्रीय अथवा गोत्रज वे व्यक्ति हैं जो किसी व्यक्ति से पितृ पक्ष के पूर्वजों अथवा वंशजों की एक अटूट श्रृखंला द्वारा संबंधित हों। उदाहरणार्थ, किसी व्यक्ति के पिता, दादा और परदादा आदि उसके गोत्रज हैं। इसी प्रकार इसके पुत्र पौत्रादि भी उसके गोत्रीय अथवा गोत्रज हैं, या यों कहिए कि गोत्रज वे व्यक्ति हैं जिनकी धमनियों में समान रक्त का संचार हो रहा हो।
गोत्रीय से आशय उन व्यक्तियों से है जिनके आपस में पूर्वजों अथवा वंशजों की सीधी पितृ परंपरा द्वारा रक्तसंबंध हों। किसी व्यक्ति के पिता के अन्य पुरुष वंशज अर्थात् भाई, भतीजा, भतीजे के पुत्रादि भी गोत्रज कहलायेंगे । ब्राह्मणों के आज जितने गोत्र पाये जाते हैं वे सब वैदिक काल के सात मूल वंशों की ही शाखा-प्रशाखा हैं। ये सात वंश भार्गव, आंगिरस, आत्रेय, काश्यप, वसिष्ठ, आगस्त्य और कौशिक हैं। ये सातों वंश बाह्य विवाही थे अर्थात् किसी भी एक वंश का पुरुष उसी वंश की कन्या से विवाह नहीं कर सकता था।
एक सामान गोत्र वाले एक ही ऋषि परंपरा के प्रतिनिधी होने के कारण भाई-बहिन समझे जाते हैं ।
गोत्र को बहिर्विवाही समूह माना जाता है अर्थात ऐसा समूह जिससे दूसरे परिवार का रक्त संबंध न हो अर्थात एक गोत्र के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते पर दूसरे गोत्र में विवाह कर सकते हैं ।
गोत्र मातृवंशीय भी हो सकता है और पितृवंशीय भी। ज़रूरी नहीं कि गोत्र किसी आदिपुरुष के नाम से चले।
हिन्दू धर्म की सभी जातियों में गोत्र पाए गए है ।
गोत्र को लेकर आयुर्वेद में स्पष्ट रूप से लिखा है की यदि समान प्रकार के रक्त में यदि मेल होता है,और उससे संतान उत्पत्ति होती है तो उस संतान का रक्त अर्थात DNA कमजोर होगा जिससे उसमे कई प्रकार की बीमारियाँ होने की सम्भावना होती है जैसे की शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का कम होना ,शारीरिक विकृतियाँ होना ,वंशानुगत बीमारियाँ होना आदि आदि ।
वर्गीकरण प्रणाली से ही वनस्पतियों की प्रजाति, कुल और वैज्ञानिक नाम के बारे में पता चलता है। किसी भी जीव या वनस्पति को परिभाषित करते समय सबसे पहले उसके वर्गीकरण का ही जिक्र किया जाता है।
नामकरण का प्रचलन वेदों के समय से ही है ।
एक ही समय में एक नाम से अनेक मनुष्य हो सकते हैं ।संभवतः उनकी विशिष्ट पहिचान के लिए पिता का नाम भी जोड़ दिया जाता था लेकिन ऐसी स्थिति भी होती थी कि किसी एक मनुष्य की एक से अधिक पत्नियां हों तब उन व्यक्तियों की पहिचान उनके माता के नाम से रहती थी ।
ठीक इसी तरह सौभरि जी के उपगोत्रों के नामकरण की भी यह परंपरा इनकी 50 पत्नियों के नाम पर हुई जोकि मान्धाता की पुत्रियां थी ।
इन्हीं के नाम से 50 उपगोत्रों का प्रादुर्भाव हुआ ।
इनके पुत्रों को उन्हीं के नाम से जाना जाने लगा ।
इस से यहाँ यह बात भी सिद्ध हो रही है कि वैदिक युग में पुरूष प्रधानता जैसी कोई अवधारणा नहीं थी जो कि आजकल आप को वर्तमान समय में देखने को मिलता है ।
वैसे सभी ब्राह्मण गोत्रों का निर्धारण ऋषियों के नाम से होता आया है । ठीक ये सिद्धान्त भी यहाँ लागू होता है कि गोत्र “अंगिरस” जोकि ब्रह्मा जी के पुत्र हैं उनके नाम पर और उपगोत्र इनके प्रपौत्र सौभरि जी, जिनकी 50 पत्नियों के नाम के आधार पर पड़ा ।
वर्तमान में समाज के सभी विवाह संबंधों में अपने पिताजी व माताजी के उपगोत्रों को छोड़कर अन्य उपगोत्रों में नया रिश्ता जोड़ा जाता है ।
ऋषि पत्नियों के नाम पर ही उपगोत्रों के नाम पड़े हैं । जैसे- बद्रिका के नाम पर बादर, श्रोत्या के नाम पर सोती, पंचरी के नाम पर पचौरी, भटी के नाम पर भाट, रमणीय के नाम पर रमैया, भाविक्रा के नाम पर भुर्रक, कुंभार्या के नाम पर कुम्हेरिया, ईड़ा के नाम पर इटोइयाँ, सिंहमुग्रा के नाम पर सीहईयां, संतरी के नाम पर सैंथरिया, बासुकी के नाम पर बसइयां, नद्या के नाम पर नंदीसरिया, बज्रावली के नाम पर बजरावत, अजहा के नाम पर अझैयां, प्ररसी के नाम पर परसैयां, नुक्ता के नाम पर नुक़्ते, श्रीकपूरी के नाम पर सिकरोरीया, दीर्घा के नाम पर दीगिया, प्रलिहा के नाम पर पल्हा, तगन्या के नाम पर तगारे, रतिवरी के नाम पर रतिवार, प्रधानी के नाम पर पधान, गोदानी के नाम पर गौदाने इत्यादि ।
1- बादर 2- सोती (सत्ल) 3- पचौरी 4-भाट (भटेले) 5-पधान 6-रतिवार 7- गौदाने (गौदानी) 8-तगारे 9-दीगिया(दीक्षित) 10- नुक़्ते (बरगला) 11-भुर्रक(भेड़े)12- रमैया 13-कुम्हेरिया 14-इटोईया 15-सीहइयाँ 16-सैंथरिया 17-बसइया 18-नन्दीसरिया 19-बजरावत 20-परसैंया 21-करिया 22-नालौठिया 23-दुरकी24-विहोन्याँ 25-ओखले 26-करौतिया27-मुडिनिया 28-गागर 29-डामर 30-गलवाले31-छिरा 32-जयन्तिया 33-डिड्रोइया 34-तैसिये35-दुर्गवार
36-दिरहरे 37-अझैयां 38-नायक 39-उमाड़िया 40-कांकर 41-रौसरिया 42-औगन 43-सिरौलिया
44-पलावार(पल्हा) 45- सिकरोरिया 46-रमैया 47-गलगीते 48- किलकिले 49-तागपुरिया 50-काट
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अखिल भारत में सौभरि ब्राह्मण समाज गाँवों की संख्या का विवरण-
जिला मथुरा (उत्तर प्रदेश) यमुना के आर वाले गांव-
1.खानपूर 2.भदावल 3. नगरिया 4.खायरा 5. बिजवारी 6.डाहरौली 7.सीह 8.पलसों 9. भरनाकलां 10.भरनाखुर्द 11.पेलखू 12.मघेरा
यमुना के पार वाले जिला अलीगढ़, हाथरस, आगरा (उत्तर प्रदेश)
1.दिहौली 2.मलिकपुरा 3.आलमपुर 4.भांकरी 5.सोनोठ 6.अलीपुर 7.मड्राक 8.नगला अहिवासी 9.तिलौठी10. भोजगढ़ी11, पेठागांव 12. सासनी12.कोड़ा 13, जटौआ 14. महासिंह का नगला 15.हाथी की गढ़ी
गंगा पार के गांव बरेली (उत्तर प्रदेश)-
1.खुर्द नबाबपुरा 2.सुकटिया 3.पृथ्वीपुर4.पिपरिया वीरपुर 5.चंद्रपुरा 6.सीतापुर 7. 8.केशरपुर 9.जगन्नाथपुर 10.बारशेर 11.दलीपुर 12.हरदासपुर 13.माहमूडपुर 14.चकरपुर 15.गोटिया
बदायूँ (उत्तर प्रदेश)-
1.भोजपुर,2.गुरयारी
अलवर जिला में आने वाले गांव (राजस्थान)
1. बदनगढ़ी 2. गारु 3.नगला सीताराम 4. नगला खूबा 5.नगला केसरी 6.नतौज 7.लाठकी 8. भोजपुरा 9. अर्र्रूआ 10.सामौली 11.रामनगर12. बालूपुरा 13.खैर मेडा
भरतपुर जिला (राजस्थान)-
1. नयावास 2. मनोहरपुर 3. जहांगीरपुर 4. सितारा 5. आजादपुरा 6. बिसदे 7. सैंथरी 8. डीग 9. कुम्हेर 10. मूंडिया 11. पड़लवास 12. कुरकेंन 13.सरसई 14. उसरारौ 15.सिकरोरी
भिंड जिला (मध्यप्रदेश)
1.काठा 2.रारी 3.मछर्या 4.बन्थारी 5.बिरखडी 6.मिहोना 7.चंडौंक 8.छिडी 9.बोहरा 10.शिकारपुरा 11.कौनरपुरा 12.अहिवासियों का पुरा 13.सोनी 14.महाराजपुरा 15.जगन्नाथपुरा 16.सीताराम की लवण 17.बिरखडी डांग 18.पिपडी 19.नौनेरा 20.खेरिया चदन 21.खेरिया बेर 22.तरौली 23.बरौली 24.भिंड
ग्वालियर जिला (मध्यप्रदेश)-
1. रंगवन
जबलपुर जिला (मध्यप्रदेश) –
1.डिढोरा 2.उड़ना 3.भोरडा 4.मेढी 5.अमरपुर6.खेड़ा 7.पथरोरा 8.पाटन 9.जटवा 10.जूरी 11.जूरीखुर्द 12.कटरा बेलखेड़ा 13.कौनरपुर
14.पथरिया 15.चंडवा 16 मेहंगवा17 सिंगौरी 18.राइयाखेड़ा 19.नोनी 20 खामदेही 21.भेड़ाघाट 22.शाहपुरा 23.बामनोढा 24.सुरई25.भरदा 26.कुआखेड़ा 27.मेली 28.पिंडराई 29.गुबरा
30.जमखार31.बेलखेड़ा बड़ा 32.कूड़ा 33.झालोंन 34.बदराई
नरसिंहपुर जिला (मध्यप्रदेश)-
1.गातेगाँव श्रीधाम 2.बगलाइ 3.कोरेगांव 4 चांडाली 5.करेली
हरदा जिला (मध्यप्रदेश)- 1.हरदा 2. ऊडा 3.भाटरपेटिया 4.डोलरिया 5.टेमागांव 6.झाडबीड़ा 7.झिरिखेड़ा 8.घोघडामाफी9. बंदीमुहाड़िया10.सिराली 11.टिमरनी 12.गोंदागांवकलां 13.सुरजना 14.रनहाई
आगर जिला(मध्यप्रदेश)
1.आगर मालवा 2.बडागाँव
शाजापुर जिला (मध्यप्रदेश)
1.पोलायकला
शिहोड़ जिला (मध्यप्रदेश)
1.नसरुल्लागंज 2.मन्झली 3.बीरखेडी
होशंगाबाद जिला (मध्यप्रदेश)-
1. होशंगाबाद
2.सिवनी मालवा
विदिशा (मध्यप्रदेश)-
1.विदिशा 2. गंजबासोदा
Total- 160 Villages
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समाज में प्रचलित त्यौहार व मेले का विवरण-
तहसील छाता, गोवर्धन, मथुरा (उत्तरप्रदेश) के यमुना के पश्चिम दिशा वाले 12 गाँवों का विवरण-
1.भरनाकलां-
मूल नाम- भरनाकलां
ब्लॉक- चौमुहाँ
थाना-बरसाना
जिला- मथुरा
संभाग/मंडल- आगरा
प्रदेश- उत्तरप्रदेश
देश -भारत
महाद्वीप-एशिया
भाषा-हिन्दी
मानक समय-IST(UTC+5:30)
समुद्र तल से ऊँचाई-184
दूरभाष कोड़- 05662
विधानसभा क्षेत्र- छाता
तहसील-गोवर्धन
लोकसभा क्षेत्र- मथुरा
जनसंख्या-4500
परिवार-450
साक्षरता-75%
स्कूल/कॉलेज- सरस्वती शिशु मंदिर, प्राइमरी विद्यालय, कैप्टन राकेश इंटर कॉलेज
बैंक- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
हॉस्पिटल-गवरमेंट अस्पताल
मंदिर-बाँके विहारी मंदिर
बाजार-शनि बाजार
विश्व के अन्य सभी देशों की तुलना में “भारत” वास्तव में आज भी गांवों का ही देश है। कला, संस्कृति, वेशभूषा के आधार पर आज भी ‘गांव’ देश की रीढ़ की हड्डी बने हुये हैं। प्रत्येक गांव का एक अपना ही महत्व होता है जिसका पता वहां रहने वाला ही जानता है। गांव में चक्की के मधुर गीत से ही सवेरा आरंभ होता है।
मेरा गांव भी भारत के लाखों गांवों जैसा ही है । लगभग साढ़े चार सौ घरों की इस बस्ती का नाम भरनाकलां है !भरनाकलां गांव छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है । गांव के पूर्व में भरनाखुर्द, पश्चिम में ततारपुर, उत्तर में सहार, दक्षिण में पाली गांव स्थित है । गांव में खाद गोदाम भी है ।
गांव के तीनौं तरफ प्रमुख तालाब हैं इसके पूर्व में श्यामकुण्ड, पश्चिम में नधा एवं दक्षिण में मुहारी(मुहारवन) है ।
रोजगार की वजह से दिल्ली की तरफ लोगों का पलायन बड़ी मात्रा में हो रहा है ।
लोग हर क्षेत्र में कार्य करने में सक्षम होते जा रहे हैं।
गांव में बारात के ठहरने के लिए बारात घर की भी व्यवस्था है ।
पीने के स्वच्छ जल की व्यवस्था गांववासियों ने बिना सरकार की सहायता लिए बगैर,स्वयं यहाँ के लोगों व्यवस्थित की गई है ।
अगर हम गांव की आबादी स्वसमाज के अनुसार देखते हैं तो करीब 50 प्रतिशत से ज्यादा की भागेदारी है और अगर अपने समाज के गोत्र के हिसाब से यहाँ, वर्गला, ईटोंइयाँ, कुम्हेरिया, पचौरी, भुर्र्क, तगर, परसैया आदि परिवार मिलते हैं । गाँव के उत्तर में कलकल करती हुई आगरा नहर बहती है । चारों और खेतों की हरियाली गाँव की शोभा बढ़ाती है । पूर्व और दक्षिण में भरतपुर फीडर(बम्बा)और पश्चिम में खार्ज बम्बा कृषि सिंचाई की पूर्ति करता है। गाँव से थोड़ी दूरी पर एक बड़ा सा बाँके विहारी जी का मंदिर है जिसके पास मुहारवन तालाब है । पाठशाला और अस्पताल गाँव के बाहर है । गाँव के सभी वर्णों के लोग यहाँ रहते हैं ।
गाँव में अधिकतर किसान रहते है । कुछ लोग भांग, तंबाखू का सेवन भी करते हैं अन्य जगहों की तुलना करने पर फिर भी मेरा गाँव अपने आप में अच्छा हैं । यहाँ प्रकर्ति की शोभा है, स्नेहभरे लोग हैं, धर्म की भावना है और मनुष्यता का प्रकाश है ।
हमारे गांव में जो आगरा नहर है वह नहर नहीं उसे ‘जीवन की धारा’ कहिए, क्योंकि जहाँ-जहाँ भी वह पहुंची है, सूखे खेतों में नया जीवन लहलहा उठा है। बंजर भूमि भी सोना उगलने लगी है। जब हम घर-द्वार से दूर किसी नगर में या वहां से भी दूर परदेश में होते हैं तो भी अपना गांव स्वप्न बनकर हमारे ह्रदय में समाया रहता है। रह-रहकर उसका स्मरण तन मन में उत्तेजना भरता रहता है।
यहाँ की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या गांवों में रहती है |आधे से अधिक लोगों का जीवन खेती पर निर्भर है इसलिए ‘गांवों के विकास’ के बिना देश का विकास किया जा सकता है, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता |
मेरे गाँव में गेंहू, चना, मक्का,ज्वार, चावल, सरसों एवं गन्ने की उपज होती है ।
गाँव के अंदर ही बैंक, एटीएम व डाकघर स्थित है। यहाँ पक्की सड़कें एवं बिजली की उत्तम उचित व्यवस्था है । होली, दीवाली, रक्षाबंधन, दशहरा , शरद पूर्णिमा बडे धूमधाम से मनाये जाते हैं विशेषकर होली का त्यौहार बड़े ही हर्ष-उल्लास के साथ सब ग्रामवासी मनाते हैं । रंगवाली होली जिसे धुलैंडी बोलते हैं उसी दिन गाँव का मेला होता है । मेले वाले दिन सभी नाते- रिश्तेदार अपने-अपने रिश्तेदारों के यहाँ आते हैं ।
उस दिन गांव में दिन निकलते ही होली का खेल शुरू हो जाता है ।सब लोग हाथों में रंग, गुलाल लिए घरों से बाहर निकल कर सभी लोगों को रंग लगाते हैं और DJ और बाजे के साथ गांव की पूरी परिक्रमा करते हैं । ये एक जुलूस की तरह होता है । ये जुलूस होली के उत्सव में चार चांद लगा देता है । यह एकता का प्रतीक है । इसमें सभी धर्म-जाति के लोग होते हैं ।
क्षेत्रफल के हिसाब से वैसे गांव ‘तीन थोक’ में बँटा हुआ है, मेले की फेरी की शुरुआत 10 विसा के रामलीला स्थान से होती है ।इसके बाद फेरी ‘पौठा चौक’से होते हुए ‘कुम्हरघड़ा हवा’की ओर बढ़ती है । इसके बाद 2.5 विसा की तरफ बढ़ते हैं जो कि ‘ईटोइयाँ परिवारों’ को रंग लगाते हुए आगे बढ़ते हुए शोभाराम प्रधान जी के घर के सामने लोग भांग का भोग लेते हैं ।
विश्राम लेने के बाद आगे बढ़ते हुए ‘कुम्हेरिया परिवारों’ की तरफ होते हुए 1.25 विसा में प्रवेश करते हैं, यहीं एक छोटा सा मंदिर भी है, सब लोग ठाकुर जी को रंग लगाते हैं ।
यहाँ आकर सारे ग्रामवासी ‘तीनों थोकौं’ इक्ट्ठे हो जाते हैं ।इस तरह से लोग धीरे -धीरे आगे रामलीला स्थान की तरफ ‘सेलवालों’ की पौरी से होते हुए चलते हैं ।
यहाँ से रास्ता थोड़ा सँकरा है इसलिए DJ वाली गाड़ी को निचले परिक्रमा मार्ग से निकालते हैं ।
इसके बाद फेरी का प्रवेश फिर से 10 विसे में होता है और रामलीला में मैदान पर आकर इस रंगवाली होली का समापन क़रते हैं । सब लोग अपने-अपने घरों को चले जाते हैं और नहा-धोकर दोपहर से लगने वाले मेले की तैयारी करते हैं । सब के यहाँ पर 12 बजे के बाद रिश्तेदार आने लगते हैं । चारों तरफ खुशियों का नजारा होता है ।
शाम को करीब 3 बजे से ‘ भरनाकलां काली कमेटी’ की तरफ से ‘काली’, पट्टेबाजी, घायल प्रदर्शनी व अलग-अलग अनौखी झाकियां निकाली जाती है ।
सुबह वाली ‘होली की फेरी’ की तरह ही इसे पूरे गांव में होकर निकालते हैं ।
6:30 बजे शाम तक इसका समापन उसी रामलीला स्थान पर आकर हो जाता है ।फिर से सब अपने -अपने घर चले जाते हैं और अतिथियों की आवभगत करते हैं । पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का भी बराबर योगदान इस दिन रहता है । वह सुबह से आने वाले सगे संबंधियों के लिए व्यंजनों की व्यवस्था करती हैं ।
इसके बाद करीब 11 बजे से रात को लोकनृत्य, नौटंकी, रसिया दंगल आदि का प्रोग्राम सुबह 4 बजे तक होता है । इस तरह से हर साल यही परंपरा सदियों से चली आ रही है ।
इसी तरह से ब्रज के अन्य गॉंवों में क्रमवार होली के मेले के आयोजन होते हैं । इसी तर्ज पर होली पर आपस मिलने के बहाने घर छोड़कर रह रहे शहरों में रहनेवाले अपनी समाज के लोग प्रतिवर्ष मात्र, नोएडा, ग्वालियर इत्यादि जगहों पर ‘होली मिलन’ समारोह क़रते हैं ।
2.भरनाखुर्द-
भरनाखुर्द गांव आगरा नहर की तलहटी में बसा हुआ है । गांव में ब्रजक्षेत्र का सबसे बड़ा कुंड ‘सूरजकुण्ड’ इसी गांव में स्थित है । आधे से ज्यादा गांव टीले पर बसा हुआ है ।
गांव में 80%आबादी स्वजनों (सौभरी ब्राह्मण समाज) की है । गांव के प्रवेश द्वार के पास बच्चों की शिक्षा के लिए महर्षि सौभरि इंटरकॉलेज बना हुआ है ।
यह भूमि गोस्वामी कल्याणदेव जी की जन्मस्थली है जिनकी तपस्या से स्वयं ‘ब्रज के राजा कृष्ण के बड़े भ्राता’श्री बलदाऊ जी’ की मूर्ति स्वप्न में दिखी थी और इसके बाद ‘श्री दाऊजी मंदिर(बलदेव)’ का निर्माण कराया । यह स्थान मथुरा से 14KM दूर मथुरा-सादाबाद रोड पर स्थित है ।
आज उन्ही के प्रभाव से नए गांव’ दाऊजी’ की स्थापना हुई जहाँ उनके वंशज “दाउजी के मंदिर’ के पंडे-पुजारी हैं । यहाँ पर सम्पूर्ण देश-विदेशों से यजमान व दर्शनार्थी ‘रेवती मैया व दाउ बाबा के दर्शन करने आते हैं ।
सूरजकुण्ड होने की वजह से भरनाखुर्द गांव के निवासियों में सूर्य की तरह तेजवान व गर्मजोशी वाले हैं । इस गांव का मेला धुलैंडी के बाद चैत्र कृष्ण द्वितीया को मनाया जाता है । संयोगवश दाउजी का हुरंगा भी द्वितीया को ही मनाया जाता है ।
3.पेलखू-
पेलखू गांव भरनाकलां से 5 KM की दूरी पर स्थित है । यह गांव गोवर्धन तहसील के अन्तर्गत आता है । यहाँ पर स्वसमाज के अलावा गुर्जर भी बड़ी मात्रा में निवास करते हैं । स्वसमाज के अगर गोत्रों की बात की जाय तो “पधान पचौरी” व “भुर्रक” उपगोत्रों की बहुलता है ।करीब पूरे गांव में 500 घर के आसपास हैं जिनमें आधे स्वसौभरी जनों के हैं ।
अपने 12 गांव जो तहसील छाता और गोवर्धन के अंतर्गत आते हैं उनमें ‘पेलखू’ गांव ने शान्ति की मिसाल कायम की हैं क्योंकि स्वजनों के अलावा ‘गुर्जर’ भारी मात्रा में हैं । गांव पेलखू के पश्चिम में भरनाखुर्द, पूर्व में राल, उत्तर में शिवाल व दक्षिण में
कोनई गांव पड़ता है ।
4.मघेरा-
गांव मघेरा गोवर्धन-वृन्दावन मार्ग पर स्थित है । 12 गॉंवों से इकलौता गांव है जो कि मथुरा तहसील में आता है । गांव की सीमाएं गांव अझही, गांव राल, छटीकरा व गांव भरतिया से लगी हुई हैं । मघेरा गांव में स्वजन सौभरि ब्राह्मण समाज का बोलबाला है ।
उपगोत्र के हिसाब से ‘भुर्रक गोत्र’ बड़ी बहुलता में मिलता है । वो इस गांव के ‘भूमियां’ हैं जहाँ भी भुर्रक गोत्री अन्य गॉंवों व शहरों में रहते हैं वो सब यही के ‘मूल निवासी’ हैं । ज्यादातर यहाँ के लोग शहरों में निकले हुये हैं । अपने 12 गांवों की तुलना में यहाँ के निवासी सबसे ज्यादा ‘शहरी’ हैं ।
साक्षरता का जो अनुपात है, उसमें भी यह गांव अव्वल है । गांव का मेला को मनाया जाता है ।
5-पलसों-
गांव पलसों ‘परशुराम खेड़ा’ के नाम से भी जाना जाता है । यह सती स्वरूपा ‘श्री हरदेवी जी’ की कर्मस्थली व पुण्यस्थली भी है ।शुरुआत से इस पावन गांव से बड़े-बड़े पहलवान होते रहे हैं ।
वर्तमान में तहसील गोवर्धन व छाता में पड़ने वाले सौभरि ब्राह्मण समाज के गांवों में जनसंख्या व क्षेत्रफल के हिसाब से दूसरे स्थान पर है ।
यह गाँव गोवर्धन-बरसाना रोड पर स्थित है ।
आसपास के गाँव जैसे, मडोरा, महरौली, भगोसा, डिरवली, छोटे नगले पलसों गांव की सीमा से लगे हुए हैं । गांव में उपगोत्रों के हिसाब से ‘परसईयाँ’ गोत्र बहुलता में हैं ।गांव के पास ही पुराना शंकर इंटर कॉलेज आज भी शिक्षा के मामले में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है । गांव के समीप ही गोवर्धन- बरसाना सड़कमार्ग पर ‘श्री हरदेवी जी ‘ का मन्दिर बना हुआ है । एक बर्ष अंदर दो मेलों का आयोजन कराने वाला इकलौता स्वजातीय गांव है ।
होली के मेले का आयोजन चैत्र कृष्ण तृतीया को तथा ‘श्री सती हरदेवी जी’ का मेला श्रावण मास की शुक्ल अष्टमी को होता है ।गांव के बाहर चारागाहों की तरह पशुओं के बैठने का भी पूरा इंतज़ाम है जिसे ‘राहमीन’ कहते हैं ।
गांव के पास ही पेट्रोल पंप व बैंक भी है जो लोगों जनसुविधा के हिसाब से आदर्श गांव की ओर इंगित करता है ।
वृतांत के अनुसार परसों अथवा पलसों नामक गाँव गोवर्धन-बरसाना के रास्ते में स्थित है। ब्रजमण्डल स्थित भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों में से यह एक है। जब अक्रूर जी, बलराम और कृष्ण दोनों भाईयों को मथुरा ले जा रहे थे, तब रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण ने गोपियों की विरह दशा से व्याकुल होकर उनको यह संदेश भेजा कि मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि परसों यहाँ अवश्य ही लौट आऊँगा। तब से इस गाँव का नाम परसों हो गया।
6.सीह-
गांव सीह भी पलसों गांव से 2 KM दूर बरसाने की तरफ गोवर्धन-बरसाना रोड़ पर स्थित है ।
जैसा कि गांव का नाम है उसी से ज्ञात होता है कि यहाँ “सीहइयाँ’ उपगोत्र के लोग ‘भूमियां’ का ताज लिए हुए हैं । दो तिहाई लोग ‘सीहइयाँ’ उपगोत्र के हैं व इनके बाद उपगोत्र ‘सिरौलिया’ आते हैं ।
गांव में होली के मेले का आयोजन चैत्र कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है
सबसे ज्यादा स्वजन ‘पुरोहिताई’ में इसी गांव से निकल कर देश के सभी हिस्सों में अपनी’ब्राह्मण कला संस्कृति’ का परिचय दे रहे हैं । गांव की सीमाएं पलसों, डिरावली, देवपुरा, डाहरौली, हाथिया गांव से सटी हुईं हैं ।
7.डाहरौली-
गांव डाहरौली गोवर्धन-बरसाना रोड़ पर स्थित है ।
जनसंख्या के हिसाब से छोटा गांव है । सीह की तरह ही पुरोहिताई में यह गांव भी अग्रणी है ।
राधारानी की जन्मस्थली बरसाना के बिल्कुल निकट है।
अन्य गांवों की तुलना में सीह, पलसों, डाहरौली तीनौं गांवों में हल्की से राजस्थान की झलक देखने को मिलती है । यहाँ जलस्तर थोड़ा नीचा है ।
होलीदहन से एक दिन पहले फ़ाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को गांव के मेले का आयोजन होता है ।
8. भदावल-
गांव भदावल छाता–बरसाना रोड पर स्थित है । भदावल गांव की सीमाएं तहसील छाता, नगरिया, खानपुर आदि गांवों से लगी हुई है। होली पर मनाया जाने वाला मेला धुलैंडी (रंगवाली होली) के दिन होता है ।
आगरा नहर की तलहटी में बसा हुआ है ।
9.खानपुर-
खानपुर गांव छाता तहसील से 2 KM की दूरी पर बसा हुआ छोटा गांव है ।
गांव की स्थति अतीत में थोडी कमजोर थी लेकिन वर्तमान में अन्य स्वजातीय गांवों को विकास के मामले में कड़ी टक्कर दे रहा है।
लगभग सभी गांववासियों ने छाता में प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट किया हुआ है ।
कृषि के अलावा ट्रैक्टरों का बिजनैस भी विकास को नया आयाम देता है ।
इसकी गांव की 5 गांवों में होती है और वो गांव हैं खायरा, भदावल, नगरिया, खानपुर, बिजवारी ।
गांव के मेले का आयोजन …..
10.नगरिया-
नगरिया गांव भी आगरा नहर से थोड़ा आगे छाता-बरसाना मार्ग पर स्थित है ।
उपगोत्रों के हिसाब से ‘दुरकी’ उपगोत्र के लोग यहाँ बहुसंख्यक हैं । जनसंख्या के लिहाज से यह 12 गांवों में सबसे छोटा गांव है ।
लेकिन कृषि के मामले में यह गांव सभी गाँवों से ऊपर है । होली पर मनाया जाने मेला….
11.-बिजवारी-
बिजवारी गांव बरसाना-नंदगांव मार्ग पर स्थित है ।
मुख्य रोड़ से आपको करीब 3 KM चलना पड़ता है गांव की ओर । यह भी छोटा सा गांव है और “रौसरिया उपगोत्री” यहाँ के भूमियां हैं ।
गांव के पास में ही बहुत मनोहर तालाब है ।
बिजवारी गांव की सीमाएं गांव खायरा, नन्दगांव आदि गांवों से लगी हुई हैं ।
होली के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले मेलों में बिजवारी का मेला सबसे पहले फाल्गुन शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है जिसे ‘बिजवारी छठ मेला’ के नाम से भी पुकारते हैं ।
वृतांत के अनुसार बिजवारी नन्दगाँव से डेढ़ मील दक्षिण-पूर्व तथा खायरा गाँव से एक मील दक्षिण में स्थित है। इस स्थान का श्रीकृष्ण तथा बलराम से घनिष्ठ सम्बंध है। प्रसंग जब अक्रूर जी, बलराम और कृष्ण दोनों भाईयों को मथुरा ले जा रहे थे, तब यहीं पर दोनों भाई रथ पर बैठे थे। उनके विरह में गोपियाँ व्याकुल होकर एक ही साथ “हे प्राणनाथ!” ऐसा कहकर मूर्च्छित होकर भूतल पर गिर गईं। उस समय सब को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो आकाश से विद्युतपुञ्ज गिर रहा हो। विद्युतपुञ्ज का अपभ्रंश शब्द ‘बिजवारी’ है। अक्रूर जी दोनों भाईयों को लेकर बिजवारी से पिसाई, सहार तथा जैंत आदि गाँवों से होकर अक्रूर घाट पहुँचे और वहाँ स्नान कर मथुरा पहुँचे। बिजवारी और नन्दगाँव के बीच में अक्रूर स्थान है, जहाँ शिलाखण्ड के ऊपर श्रीकृष्ण के चरण चिह्न हैं। सौभरि जी के मंदिर के जो महंत हैं वो उन्ही के वंशज “सौभरेय ब्राह्मण” ही हैं ।
12.-खायरा-
गांव खायरा छाता-बरसाना मार्ग पर स्थित है ।
यह स्वजाति सौभरि ब्राह्मण समाज व अपने इस क्षेत्र का सब से बड़ा तख्त गॉंव है ।
इस गांव ने “12 गांवों की राजधानी” के नाम से प्रसिद्धी पायी हुई है ।लगभग 12000 की जनसंख्या वाले इस गांव में होली के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला मेला ब्रज की अंतिम होली के दिन चैत्र कृष्ण पंचमी को मनाया जाता है जिसे रंगपंचमी के नाम से भी जाना जाता है ।
गांव का नाम भगवान कृष्ण के गौरवशाली इतिहास से भी जुड़ा हुआ है । यहाँ पर ब्रज के प्रसिद्ध वनों में एक खदिरवन भी यहीं स्थित है । इसी वन में कंस द्वारा भगवान कृष्ण को मारने के लिए भेजे गये बकासुर राक्षस का वध स्वयं बाल कृष्ण ठाकुर जी ने किया था ।
बकासुर एक बगुले का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को मारने के लिए इसी वन में पहुंचा था जहाँ कान्हा और सभी ग्वालबाल खेल रहे थे। तब बकासुर ने बगुले का रूप धारण कर कृष्ण को निगल लिया और कुछ ही देर बाद कान्हा ने उस बगुले की चौंच को चीरकर उसका वध कर दिया।
यह ब्रज के १२ वनों में से एक है। यहाँ श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ तर-तरह की लीलाएं करते थे। यहाँ पर खजूर के बहुत वृक्ष थे। यहाँ पर श्री कृष्ण गोचारण के समय सभी सखाओं के साथ पके हुए खजूर खाते थे।
होली के मेले का आयोजन मुख्य रूप से ‘पड़ाव’ जगह पर होता है । इस दिन क्षेत्र के विधायक व प्रशासन अधिकारी मौजूद रहते हैं । इस दिन 12 गांवों के अलावा आसपास के गांवों से भी लोगों का तांता लगा रहता है । अच्छे से अच्छी मनोहर झांकियां निकाली जाती हैं साथ में पुरूस्कृत भी किया जाता है । रात्रि को स्वांग, रसियादंगल, डांस कॉम्पिटिशन इत्यादि तरह के मनोहारी खेल होते हैं ।
सीलिए वह यमुना के उक्त कुण्ड में रहने आ गया था। ब्रह्मर्षि सौभरि जी का यहाँ मंदिर बना है ।
वृतांत के अनुसार उस समय उसकी भयंकर आकृति को देखकर समस्त सखा लोग डरकर बड़े ज़ोर से चिल्लाये ‘खायो रे ! खायो रे ! किन्तु कृष्ण ने निर्भीकता से अपने एक पैर से उसकी निचली चोंच को और एक हाथ से ऊपरी चोंच को पकड़कर उसको घास फूस की भाँति चीर दिया। सखा लोग बड़े उल्लासित हुए। ‘खायो रे ! खायो रे !’ इस लीला के कारण इस गाँव का नाम ‘खायारे’ पड़ा जो कालान्तर में ‘खायरा’ हो गया। यहाँ खदीर के पेड़ होने के कारण भी इस गाँव का नाम ‘खदीरवन’ पड़ा है। खदीर (कत्था) पान का एक प्रकार का मसाला है। कृष्ण ने बकासुर को मारने के लिए खदेड़ा था। खदेड़ने के कारण भी इस गाँव का नाम ‘खदेड़वन’ या ‘खदीरवन’ है।
B- शरदपूर्णिमा-
C- अहोई अष्टमी-
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समाज की अनमोल विरासत के प्रतीक- सौभरि ब्राह्मण समाज की विरासत विरासत के रूप में ब्रह्म ऋषि सौभरि(जल के अंदर मैडिटेशन करने की विद्या ) से लेकर आज तक की वो चीजें जो इनसे ताल्लुक रखती हों वो सब विरासत के रूप में हैं |
बतौर विरासत के रूप में कुछ इस प्रकार हैं-
1-सुनरख गांव (निकास स्थान)व रामताल कुंड-
सुनरख गांव यमुना जी की किनारे बसा हुआ ऐतिहासिक गांव है। यह ब्रह्मऋषि सौभरि जी की तपस्थली है ।
वृन्दावन से 2KM की दूरी पर बसे इसे पौराणिक गांव को सुनरख बाँगर के नाम से भी जाना जाता है ।
आपने कालिया नाग और गरुड़ की कथा तो सुनी ही होगी वो यही इसी स्थान की घटना है ।
कालिय नाग कद्रू का पुत्र और पन्नग जाति का नागराज था। वह पहले रमण द्वीप में निवास करता था, किंतु पक्षीराज गरुड़ से शत्रुता हो जाने के कारण वह यमुना नदी में एक कुण्ड में आकर रहने लगा था। यमुना का यह कुण्ड गरुड़ के लिए अगम्य था, क्योंकि इसी स्थान पर एक दिन क्षुधातुर गरुड़ ने तपस्वी सौभरि के मना करने पर भी अपने अभीष्ट मत्स्य को बलपूर्वक पकड़कर खा डाला था, इसीलिए महर्षि सौभरि ने गरुड़ को शाप दिया था कि यदि गरुड़ फिर कभी इस कुण्ड में घुसकर मछलियों को खायेंगे तो उसी क्षण प्राणों से हाथ धो बैठेंगे। कालिया नाग यह बात जानता था ।
यहाँ रास-सत्संग अक्सरकर होते-रहते हैं । भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े होने के कारण संस्था द ब्रज फाउंडेशन कुंड का जीर्णोद्धार करा रही है। संस्था के पदाधिकारियों ने एसएसआई को यहां उत्खनन में पुरातात्विक वस्तुएं मिलने की सूचना दी थी।
माना जाता है कि यह पौराणिक स्थली कृष्णकालीन धरोहर है और महर्षि सौभरि की तपस्थली रही है।
पुराणों के अनुसार इस कुंड का क्षेत्रफल लगभग 63 एकड़ है, लेकिन संस्था को कुछ एकड़ की ही खोदाई करने की अनुमति दी गई। बाकी पर अवैध कब्जे कर लिए गए हैं या पट्टे काट दिए गए। उन्होंने बताया कि ये भग्नावेष 1700 वर्ष पूर्व के कुषाणकालीन हैं।
नालंदा एवं हड़प्पा तरह एक प्रागेतिहासिक धरोहर के रुप में संवारा जाए। जिससे इतिहास, पुरातत्व एवं इंजीनियरिंग के छात्र भी भविष्य में इसका अध्ययन करने आ सकें।
एक बार मांधाता के राज्य में सूखा पड़ गयी थी तो सौभरि जी के द्वारा यहाँ यज्ञ किया गया था ।तब देवताओं के राजा इंद्र जी ने वर्षा कराई थी ।
सौभरि जी कालिया नाग के अलावा अन्य जीवों को भी गरुड़ से सुरक्षित इसी स्थान पर रखा ।
2-दाऊजी मंदिर व बल्देव कस्बा-
यह स्थान मथुरा जनपद में ब्रजमंडल के पूर्वी छोर पर स्थित है। मथुरा से 21 कि०मी० दूरी पर एटा-मथुरा मार्ग के मध्य में स्थित है। मार्ग के बीच में गोकुल एवं महावन जो कि पुराणों में वर्णित वृहद्वन के नाम से विख्यात है, इसी मार्ग पर पड़ते हैं। यह स्थान पुराणोक्त विद्रुमवन के नाम से निर्दिष्ट है।
दाऊजी के मंदिर में दाऊ बाबा की अत्यन्त मनोहारी विशाल प्रतिमा उनकी सहधर्मिणी ज्यौंतिस्मती रेवती जी का विग्रह है। यह एक विशालकाय देवालय है जो कि एक दुर्ग की भाँति सुदृढ प्राचीरों से आवेष्ठित है। मन्दिर के चारों ओर सर्प की कुण्डली की भाँति परिक्रमा मार्ग में एक पूर्ण पल्लवित बाज़ार है। इस मन्दिर के चार मुख्य दरवाजे हैं, जो क्रमश: सिंहचौर, जनानी ड्योढी, गोशालाद्वार या बड़वाले दरवाज़े के नाम से जाने जातेहैं। मन्दिर के पीछे एक विशाल कुण्ड है जो कि बलभद्रकुण्ड के नाम से पुराणों में वर्णित है। आजकल इसे क्षीरसागर के नाम से पुकारते हैं।
श्री दाऊजी की मूर्ति- देवालय मेंपूर्वाभिमुख 2 फुट ऊँचे संगमरमर के सिंहासन पर स्थापित है। पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के पौत्र श्रीवज्रनाभ ने अपने पूर्वजों की पुण्यस्मृति में तथा उनके उपासना क्रम को संस्थापित करने हेतु 4 देवविग्रह तथा 4 देवियों की मूर्तियाँ स्थापित की थीं जिन में से श्रीबलदेवजी का यही विग्रह है जो कि द्वापरयुग के बाद कालक्षेप से भूमिस्थ हो गया था। पुरातत्ववेत्ताओं का मत है यह मूर्तिपूर्व कुषाण कालीन है जिसका निर्माण काल 2 सहस्र या इससे अधिक होना चाहिये। ब्रजमण्डल के प्राचीन देवस्थानों में यदि श्रीबलदेव जी विग्रह को प्राचीनतम कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं। ब्रज के अतिरिक्त शायद ही कहीं इतना विशाल वैष्णव श्रीविग्रह दर्शन को मिले। यह मूर्ति क़रीब 8 फुट ऊँची एवं साढे तीन फुट चौडी श्याम वर्ण की है। पीछे शेषनाग सात फनों से युक्त मुख्य मूर्ति की छाया करते हैं। मूर्ति नृत्यमुद्रा में है, दाहिना हाथ सिर से ऊपर वरद मुद्रा में है एवं बाँये हाथ में चषक है।विशाल नेत्र, भुजाएं-भुजाओं में आभूषण, कलाई में कंडूला उत्कीर्णित हैं। मुकट में बारीक नक्काशी का आभास होता है पैरों में भी आभूषण प्रतीत होते हैं तथा कटि में धोती पहने हुए हैं मूर्ति के कान में एक कुण्डल है तथा कण्ठ में वैजन्ती माला उत्कीर्णित हैं। मूर्ति के सिर के ऊपर से लेकर चरणों तक शेषनाग स्थित है। शेषनाग के तीन वलय हैं जो कि मूर्ति में स्पष्ट दिखाई देते हैं और योग शास्त्र की कुण्डलिनी शक्ति के प्रतीक रूप हैं क्योंकि पौराणिक मान्यता के अनुसार बलदेव जी शक्ति के प्रतीक योग एवं शिलाखण्ड में स्पष्ट दिखाई देती हैं जो कि सुबल, तोष एवं श्रीदामा सखाओं की हैं। बलदेव जी के सामने दक्षिण भाग में दो फुट ऊँचे सिंहासन पर रेवती जी की मूर्ति स्थापित हैं जो कि बलदेव जी के चरणोन्मुख है और रेवती जी के पूर्ण सेवा-भाव की प्रतीक है। यह मूर्ति क़रीब पाँच फुट ऊँची है। दाहिना हाथ वरदमुद्रा में तथा वाम हस्त क़मर के पास स्थित है। इस मूर्ति में भी सर्पवलय का अंकन स्पष्ट है। दोनों भुजाओं में, कण्ठ में, चरणों में आभूषणों का उत्कीर्णन है। उन्मीलित नेत्रों एवं उन्नत उरोजों से युक्त विग्रह अत्यन्त शोभायमान लगता हैं। सम्भवत: ब्रजमण्डल में बलदेव जी से प्राचीन कोई देव विग्रह नहीं। ऐतिहासिक प्रमाणों में चित्तौड़ के शिलालेखों में जो कि ईसा से पाँचवी शताब्दी पूर्व के हैं, बलदेवोपासना एवं उनके मन्दिर को इंगित किया है। अर्पटक, भोरगाँव नानाघटि का के शिला लेख जो कि ईसा के प्रथम द्वितीय शाताब्दी के हैं, जुनसुठी की बलदेव मूर्ति शुंगकालीन है तथा यूनान के शासक अगाथोक्लीज की चाँदी की मुद्रा पर हलधारी बलराम की मूर्ति का अंकन सभी “बलदेव जी की पूजा उपासनाऐं वंजनमान्यओं के प्रतीक” हैं।
मूर्तिकाप्राकट्य- इस बलदेव मूर्ति के प्राकट्य का भी एक बहुत रोचक इतिहास है। मध्य युग का समय था मुग़ल साम्राज्य का प्रतिष्ठा सूर्य मध्यान्ह में था। अकबर अपने भारीश्रम, बुद्धि चातुर्य एवं युद्ध कौशल से एक ऐसी सल्तनत की प्राचीर के निर्माण में रत था जो कि उस के कल्पनालोक की मान्यता के अनुसारक भी न ढहें और पीढी-दर-पीढी मुग़लिया ख़ानदान हिन्दुस्तानकी सरज़मीं पर निष्कंटक अपनी सल्तनत को क़ायम रखकर गद्दी एवं ताज का उपभोग करते रहें।
एक ओर यह मुग़लों की स्थापना का समय था दूसरी ओर मध्ययुगीन धर्माचार्य एवं सन्तों के अवतरण तथा अभ्युदय का स्वर्णयुग। ब्रजमंडल में तत्कालीन धर्माचार्यों में महाप्रभु बल्लभाचार्य, श्री निम्बकाचार्य एवं चैतन्य संप्रदाय की मान्यताएं अत्यन्त लोकप्रिय थीं।
गोवर्धन की तलहटी में एक बहुत प्राचीनतीर्थ-स्थल सूर्यकुण्ड तटवर्तीग्राम भरना-खुर्द (छोटाभरना) था। इसी सूर्य कुण्ड के घाट पर परम सात्विक ब्राह्मण वंशावतंश गोस्वामी कल्याणदेवाचार्य तपस्या करते थे। उनका जन्म भी इसी ग्राम में अभयराम जी के घर में हुआ था। वे श्रीबलदेवजी के अनन्य अर्चक थे।
एक दिन श्रीकल्याण-देवजी को ऐसी अनुभूति हुई कि उनका अन्तर्मन तीर्थाटन का आदेश दे रहा है। कुछ समय यों-ही बिताया किन्तु स्फुरणा बलवती ही होती जा रही थी अत: कल्याण-देवजी ने जगदीश यात्रा का निश्चय कर घर से प्रस्थान कर दिया श्री गिर्राज परिक्रमा कर मानसीगंगा में स्नानकिया और फिर पहुँचे मथुरा, यमुना स्नान, दर्शन कर आगे बढ़े और पहुँचे विद्रुमवन जहाँ आज का वर्तमान बल्देव नगर है। यहाँ रात्रि विश्राम किया। सघनवट-वृक्षों की छाया तथा सरोवर का किनारा ये दोनों स्थितियाँ उनको रमीं। फलत: कुछ दिन यहीं तप करने का निश्चय किया। एक दिन अपने आन्हिक कर्म से निवृत हुये ही थे कि दिव्यहल-मूसलधारी भगवान श्रीबलराम उनके सम्मुख प्रकट हुये तथा बोले कि मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, वर माँगो। कल्याण-देवजी ने करबद्ध प्रणाम कर निवेदन किया कि प्रभु आपके नित्य दर्शन के अतिरिक्त मुझे कुछ भी अभीष्ट नहीं हैं। अत: आप नित्य मेरे घर विराजें।बलदेवजी ने तथास्तु कहकर स्वीकृति दी और अन्तर्धान हो गये।साथ ही यह भी आदेश किया कि ‘जिस प्रयोजन हेतु जगदीश यात्रा कर रहे हो, वे सभी फल तुम्हें यहीं मिलेंगे, इस हेतु इसी वट-वृक्ष के नीचे मेरी एवं श्री रेवती की प्रतिमाएं भूमिस्थ हैं, उनका प्राकट्य करो’।अब तो कल्याण-देवजी की व्यग्रता बढ गई और जुट गये भूमि के खोदने में, जिस स्थान का आदेश श्रीबलराम|दाऊजी ने किया था।
इधर एक और विचित्र आख्यान उपस्थित हुआ कि जिस दिन श्रीकल्याण-देवजी को साक्षात्कार हुआ उसी पूर्वरात्रि को गोकुल में श्रीमद्बल्लभाचार्य महाप्रभु के पौत्र गोस्वामीगोकुलनाथजी को स्वप्न हुआ कि ‘जो श्यामा गौ के बारे में आप चिन्तित हैं वह नित्य दूध मेरी प्रतिमा ऊपर स्त्रवित कर देती है। ग्वाला निर्दोष है।मेरी प्रतिमाएं विद्रुमवन में वट-वृक्ष के नीचे भूमिस्थ हैं प्राकट्य कराओ ‘ यह श्यामा गौसद्य: प्रसूता होने के बावजूद दूध नहीं देती थी। महाराज श्री को दूध के बारे ग्वाला के ऊपर सन्देह होता था। प्रभु की आज्ञा से गोस्वामी जी ने उपर्युक्त स्थल पर जाने का निर्णय किया वहाँ जाकर देखा कि श्रीकल्याण-देवजी मूर्ति युगल को भूमि से खोदकर निकाल चुके हैं। वहाँ पहुँचकर नमस्कार अभिवादन के उपरान्त दोनों ने अपने-अपने वृतान्त सुनाये।अत्यन्त हर्ष विह्वल धर्माचार्य हृदय को विग्रहों के स्थापन के निर्णय की चिन्ता हुई और निश्चय किया कि इस घोर जंगल से मूर्ति द्वय को हटाकर क्यों न श्री गोकुल में प्रतिष्ठित किया जाय। एतदर्थ अनेक गाडी मँगा यी किन्तु मूर्ति अपने स्थान से नहीं हिली, कहते हैं कि चौबीस बैल और अनेक व्यक्तियों के द्वारा हटाये जाने पर भी, टस से मस न हुई और इतना श्रम व्यर्थ गया।हार मानकर यही निश्चय किया गया कि दोनों मूर्तियों को अपने प्राकट्य के स्थान प रही प्रतिष्ठित कर दिया जाय।अत: जहाँ श्रीकल्याण-देव तपस्या करते थे उसी पर्ण कुटी में सर्वप्रथम स्थापना हुई जिस के द्वारा कल्याण देवजी को नित्य घर में निवास करने का दिया गया ।
यह दिन संयोगत: मार्गशीर्ष मास की पूर्णमासी थी।षोडसोपचार क्रम से वेदाचार के अनुरूप दोनों मूर्तियों की अर्चना की गई तथा सर्वप्रथम श्री ठाकुरजी को खीर का भोग रखा गया, अत: उस दिन से लेकर आज पर्यन्त प्रतिदिन खीर भोग में अवश्य आती है। गोस्वामी गोकुलनाथजी ने एक नवीन मंदिर के निर्माण का भार वहन करने का संकल्प लिया तथा पूजा अर्चना का भार उस दिन से अद्यावधि कल्याण वंशज ही श्रीठाकुरजी की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं यह दिनमार्ग शीर्ष पूर्णिमा सम्वत् 1638 विक्रम था। एक वर्ष के भीतर पुन: दोनों मूर्तियों को पर्णकुटी से हटाकर श्री गोस्वामी महाराज श्री केनव-निर्मित देवालय में, जो कि सम्पूर्ण सुविधाओं से युक्त था, मार्गशीर्ष पूर्णिमा संवत 1639 को प्रतिष्ठित कर दिया गया। यह स्थान कहते हैं भगवान बलराम की जन्म-स्थली एवं नित्य क्रीड़ास्थली है पौराणिक आख्यान के अनुसार यह स्थान नन्दबाबा के अधिकार क्षेत्र में था। यहाँ बाबा की गौ के निवास के लिये बड़े-बड़े खिरक निर्मित थे।
मगधराज जरासंध के राज्य की पश्चिमी सीमा यहाँ लगती थीं, अत: यह क्षेत्र कंस के आतंक से प्राय: सुरक्षित था। इसी निमित्त नन्दबाबा ने बलदेव जी की माता रोहिणी को बलदेव जी के प्रसव के निमित इसी विद्रुमवन में रखा था और यहीं बलदेवजी का जन्म हुआ जिसके प्रतीक रूप रीढ़ा (रोहिणेयक ग्राम का अपभ्रंश नाम अबैरनी, (बैर रहित क्षेत्र)) दोनों ग्राम आज तक मौजूद हैं। धीरे धीरे समय बीत गया बलदेव जी की ख्याति एवं वैभव निरन्तर बढ़ता गया और समय आ गया धर्माद्वेषी शंहशाह औरंगजेब का जिसका मात्र संकल्प समस्त हिन्दूदेवी-देवताओं की मूर्तिभंजन एवं देवस्थान को नष्ट-भ्रष्ट करना था। मथुरा के केशवदेव मन्दिर एवं महावन के प्राचीनतम देवस्थानों को नष्ट-भ्रष्ट करता आगे बढा तो उसने बलदेव जी की ख्याति सुनी व निश्चय किया कि क्यों न इस मूर्ति को तोड़ दिया जाय।फलत: मूर्ति भंजनी सेना को लेकर आगे बढ़ा।कहते हैं कि सेना निरन्तर चलती रही जहाँ भी पहुँचते बलदेव की दूरी पूछने पर दो को सही बताई जाती जिससे उसने समझा कि निश्चय ही बल्देव कोई चमत्कारी देवविग्रह है, किन्तु अधमोन्मार्द्ध से ना लेकर बढ़ता ही चला गया जिसके परिणाम-स्वरूप कहते हैं कि भौरों और ततइयों (बेर्रा) का एक भारी झुण्ड उसकी सेना पर टूट पडा जिससे सैकडों सैनिक एवं घोडे आहत होकर काल कवलित हो गये। औरंगजेब ने स्वीकार किया देवालय का प्रभाव और शाही फ़रमान जारी किया जिसके द्वारा मंदिर को ५ गाँव की माफी एवं एक विशाल नक्कार खाना निर्मित कराकर प्रभु को भेंट किया एवं नक्कार खाना की व्यवस्था हेतु धन प्रतिवर्ष राजकोष से देने के आदेश प्रसारित किया। वहीं नक्कार खाना आज भी मौजूद है और यवन शासक की पराजय का मूक साक्षी है।
इसी फरमान-नामे का नवीनीकरण उसके पौत्र शाहआलम ने सन् 1196 फसली की ख़रीफ़ में दो गाँव और बढ़ा कर यानी 7 गाँव कर दिया जिनमें खड़ेरा, छवरऊ, नूरपुर, अरतौनी, रीढ़ा आदि जिसको तत्कालीन क्षेत्रीय प्रशासक (वज़ीर) नज़फखाँ बहादुर के हस्ताक्षर से शाही मुहर द्वारा प्रसारित किया गया तथा स्वयं शाहआलम ने एक पृथक्से आदेश चैत्र सदी 3 संवत 1840 को अपनी मुहर एवं हस्ताक्षर से जारी किया। शाह आलम के बाद इस क्षेत्र पर सिंधिया राजवंश का अधिकार हुआ। उन्होंने सम्पूर्ण जागीर को यथा स्थान रखा एवं पृथक्से भोग राग माखन मिश्री एवं मंदिर के रख-रखाव के लिये राजकोष से धन देने की स्वीकृति दिनाँक भाद्रपद-वदी चौथ संवत 1845 को गोस्वामी कल्याण देव जी के पौत्र गोस्वामी हंसराज जी, जगन्नाथ जी को दी। यह सारी जमींदारी आज भी मंदिर श्री दाऊजी महाराज एवं उनके मालिक कल्याण वंशज, जो कि मंदिर के पण्डा पुरोहित कहलाते हैं, उनके अधिकार में है।
मुग़लकाल में एक विशिष्ट मान्यता यह थी कि सम्पूर्ण महावन तहसील के समस्त गाँवों में से श्री दाऊजी महाराज के नाम से पृथक्देव स्थान खाते की माल गुजारी शासन द्वारा वसूल कर मंदिर को भेंट की जाती थी, जो मुगल काल से आज तक “शाही ग्रांट” के नाम से जानी जाती हैं, सरकारी खजाने से आज तक भी मंदिर को प्रति वर्ष भेंट की जाती है।
ब्रिटिशशासन- इसके बाद फिरंगी का जमाना आया। ब्रज का यह मन्दिर सदैव से ही देश-भक्तों के जमावड़े का केन्द्र रहा और उनकी सहायता एवं शरण-स्थल का एक मान्य-स्रोत भी। जब ब्रिटिश शासन को पता चला तो उन्होंने मन्दिर के मालिका पण्डों को आगाह किया कि वे किसी भी स्वतन्त्रता प्रेमी को अपने यहाँ शरण न दें परन्तु आत्मीय सम्बन्ध एवं देश के स्वतन्त्रता प्रेमी मन्दिर के मालिकों ने यह हिदायत नहीं मानी, जिस से चिढ़कर अंग्रेज शासकों ने मन्दिर के लिये जो जागीरें भूमि एवं व्यवस्थाएं पूर्वशाही परिवारों से प्रदत्त थी उन्हें दिनाँक 31 दिसम्बरसन् 1841 को स्पेशल कमिश्नर के आदेश से कुर्की कर जब्त कर लिया गया और मन्दिर के ऊपर पहरा बिठा दिया जिस से कोई भी स्वतन्त्रता प्रेमी मन्दिर में न आ सके परन्तु किले जैसे प्राचीरों से आवेष्ठित मन्दिर में किसी दर्शनार्थी को कैसे रोक लेते? अत: स्वतन्त्रता संग्रामी दर्शनार्थी के रूप में आते तथा मन्दिर में निर्बाध चलने वाले सदावर्त एवं भोजन व्यवस्था का आनन्द लेते ओर अपनी कार्य-विधि का संचालन करके पुन:अपने स्थान को चले जाते। अत: प्रयत्न करने के बाद भी गदर प्रेमियों को शासन न रोक पाया।
मान्यताएं- बलदेव एक ऐसा तीर्थ है जिसकी मान्यताएं हिन्दू धर्मा्वलम्बी करते आये हैं। धर्माचार्यों में श्रीमद् बल्लभाचार्य जी के वंश की तो बात ही पृथक्है । निम्बार्क, माध्व, गौड़ीय, रामानुज, शंकर कार्ष्णि, उदासीन आदि समस्त धर्माचार्यो में बलदेव जी की मान्यताएं हैं। सभी नियमित रूप से बलदेव जी के दशनार्थ पधारते रहे हैं और यह क्रम आज भी जारी है।इसके साथ ही एक धक्का ब्रिटिशराज में मंदिर को तब लगा जब ग्राउस यहाँ का कलेक्टर नियुक्त हुआ। ग्राउस महोदय का विचार था कि बलदेव जैसे प्रभावशाली स्थान पर एक चर्च का निर्माण कराया जाय क्योंकि बलदेव उस समय एक मूर्धन्य तीर्थ स्थल था। अत: उसने मंदिर की बिना आज्ञा के चर्च निर्माण प्रारम्भ कर दिया। शाही जमाने से ही मंदिर की 256 एकड़ भूमि में मंदिर की आज्ञा के बगैर कोई व्यक्ति किसी प्रकार का निर्माण नहीं करा सकता था क्योंकि उपर्युक्त भूमि के मालिक जमींदार श्री दाऊजी हैं तो उनकी आज्ञा के बिना कोई निर्माण कैसे हो सकता था? परन्तु उन्मादी ग्राउस महोदय ने बिना कोई परवाह किये निर्माण कराना शुरू कर दिया। मंदिर के मालिकान ने उसको बलपूर्वक ध्वस्त करा दिया जिससे चिढ़-कर ग्राउस ने पंडावर्ग एवं अन्य निवासियों को भारी आतंकित किया तो आगरा के एक मूर्धन्य सेठ एवं महाराज मुरसान के व्यक्तिगत प्रभाव का प्रयोग कर वायसराय से भेंट कर ग्राउस का स्थानान्तरण बुलन्दशहर कराया जिस स्थान पर चर्च का निर्माण कराने की ग्राउस की हठ थीं। उसी स्थान पर आज वहाँ बेसिक प्राइमरी पाठशाला है जो पश्चिमी स्कूल के नाम से जानी जाती है यह ग्राउस की पराजय का मूक साक्षी है।
मुख्यआकर्षण- वैसे बलदेव में मुख्य आकर्षण श्री दाऊजी का मंदिर है।किन्तु इसके अतिरिक्त क्षीर सागर तालाब जो कि क़रीब 80 गज चौड़ा 80 गज लम्बा है।जिसके चारों ओर पक्के घाट बने हुए हैं जिसमें हमेशा जल पूरित रहता है।उस जल में सदैव जैसे दूध पर मलाई होती है उसी प्रकार काई (शैवाल) छायी रहती है। दशनार्थी इस सरोवर में स्नान आचमन करते हैं,पश्चात दर्शन को जाते हैं।
पर्वोत्सव- मन्दिर पर्वोत्सव-मन्दिर मूलत: बलभद्र सम्प्रदायी है किन्तु पूजार्चन में ज़्यादा-तर प्रसाव पुष्टिमार्गीय है।वैसे वर्ष-भर कोई न कोई उत्सव होता ही रहता है किन्तु मुख्यत: वर्ष प्रतिपदा, चैत्र पूर्णिमा बलदेव जी कारासोत्सव अक्षयतृतीया, (चरणदर्शन) गंगादशहरा, देवशयनी एकादशी, समस्त श्रावणमास के झूलोत्सव, श्रीकृष्णजन्माष्टमी, बलदेव श्रीदाऊजी का जन्मोत्सव (भाद्रपदशुक्ल 6) तथा राधाष्टमी, दशहरा, शरदपूर्णिमा, दीपमालिका, गोवर्धनपूजा, (अन्नकूट) यमद्वितीया तथा अन्य समस्त कार्तिक मास के उत्सव मार्गशीर्षपूर्णिमा (पाटोत्सव) तथा माघकी बसंतपंचमी से प्रारम्भ होकर चैत्रकृष्ण-पंचमीतकका 1-1/2 माहका होली उत्सव प्रमुख है।होली में विशेषकर फाल्गुन शुक्ल 15 को होलीपूजन सम्पूर्ण हुरंगा जो कि ब्रजमंडल के होली उत्सव का मुकुटमणि है, अत्यन्त सुरम्य एवं दर्शनीय हैं। पंचमी को होली उत्सव के बाद 1 वर्ष के लिये इस मदन-पर्व को विदायी दी जाती है। वैसे तो बलदेव में प्रतिमाह पूर्णिमा को विशेष मेला लगता है फिर भी विशेष कर चैत्रपूर्णिमा, शरदपूर्णिमा, मार्गशीर्ष पूर्णिमा एवं देवछट को भारी भीड़ होती है। इसके अतिरिक्त वर्ष-भर हजारों दर्शनार्थी प्रतिदिन आते हैं।भगवान विष्णु के अवतारों की तिथियों को विशेष स्नान भोग एवं अर्चना होती है तथा 2 बार स्नान श्रृंगार एवं विशेष भोग राग की व्यवस्था होती है। यहाँ का मुख्य प्रसाद माखन एवं मिश्री है तथा खीर का प्रसाद, जो कि नित्य भगवान ग्रहण करते हैं ।
दर्शन का क्रम- यहाँ दर्शन का क्रम प्राय: गर्मी में अक्षय तृतीया से हरियाली तीज तक प्रात: 6 बजे से 12 बजे तक दोपहर 4 बजे से 5 बजे तक एवं सायं 7 बजे से 10 तक होते हैं। हरियाली तीज से प्रात: 6 से 11 एवं दोपहर 3-4 बजे तक एवं रात्रि 6-1/2 से 9 तक होतेहैं।
मन्दिर में समय- समय पर दर्शन, एवं उत्सवों के अनुरूप यहाँ की समाज गाय की अत्यन्त प्रसिद्ध है। यहाँ की साँझीकला जिसका केन्द्र मन्दिर ही है अत्यन्त प्रसिद्ध है। बलदेव को पट्टेबाजी का, अखाड़ेबन्दी (जिसमें हथियार चलाना लाठी भाँजना आदि) का बड़ा शौक़ है समस्त मथुरा जनपद एवं पास-पड़ौसी जिलों में भी यहाँ का `काली` का प्रदर्शन अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि का है। बलदेव के मिट्टी के बर्तन बहुत प्रसिद्ध हैं। यहाँ का मुख्य प्रसाद माखन मिश्री तथा श्री ठाकुर जी को भाँग का भोग लगने से यहाँ प्रसाद रूप में भाँग पीने के शौक़ीन लोगों की भी कमी नहीं। भाँग तैयार करने के भी कितने ही सिद्धहस्त-उस्ताद हैं यहाँ की समस्त परम्पराओं का संचालन आज भी मन्दिर से होता है। यदि सामंती युग का दर्शन करना हो तो आज भी बलदेव में प्रत्यक्ष हो सकता है। आज भी मन्दिर के घंटे एवं नक्कारखाने में बजने वाली बम्ब की आवाज से नगर के समस्त व्यापार व्यवहार चलते हैं।
महामना मालवीय जी, पं०मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, मोहनदास करमचन्दगाँधी (बापू) माता कस्तूरबा, राष्ट्रपति डॉ०राजेन्द्रप्रसाद, राजवंशी देवीजी, डॉ०राधाकृष्णजी, सरदार बल्लभभाई पटेल, मोरारजी देसाई, दीनदयाल जी उपाध्याय, जैसे श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, भारतेन्दु बाबू हरिशचन्द्रजी, हरिओमजी, निरालाजी, भारत के मुख्यन्यायाधीश जस्टिस बांग्चू ,के०एन० जी जैसे महापुरुष बलदेव दर्शनार्थ आ चुके हैं |
3-गोवर्धन कुन्ज
4-वृन्दावन कुन्ज
5-वृन्दावन शोधसंस्थान
6-कण्वऋषि आश्रम, कोटद्वार
7-प्रभुदत्त ब्रह्माचारी आश्रम झूसी, प्रयागराज
8-सूरजकुण्ड भरनाखुर्द
9-खदिरवन खायरा
10-सती हरदेवी मंदिर पलसों
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सौभरि समाज के महान व्यक्तित्व-
1- गोस्वामी कल्याणदेव जी-
एक दिन श्री कल्याण-देवजी ने मथुरा तीर्थाटन का निश्चय कर घर से प्रस्थान कर दिया, श्री गिर्राज परिक्रमा कर के मानसी गंगा में स्नान किया और फिर पहुँचे मथुरा नगरी, यहाँ श्री कल्याण देव जी ने श्री यमुना जी में स्नान किया और दर्शन कर आगे बढ़े और पहुँचे विद्रुमवन जहाँ आज का वर्तमान बल्देव नगर है। यहाँ रात्रि विश्राम किया। सघन वट-वृक्षों की छाया तथा यमुना जी का किनारा ये दोनों स्थितियाँ उनको भा गई। फलत: कुछ दिन यहीं तप करने का निश्चय किया।
एक दिन अपने नित्य कर्म से निवृत हुये ही थे कि दिव्य हल मूसलधारी भगवान श्री बलराम उनके सम्मुख प्रकट हुये तथा बोले कि मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, वर माँगो। कल्याण देवजी ने करबद्ध प्रणाम कर निवेदन किया कि प्रभु आपके नित्य दर्शन के अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। अत: आप नित्य मेरे घर विराजें। बलदेवजी ने तथास्तु कहकर स्वीकृति दी और अन्तर्धान हो गये। साथ ही यह भी आदेश किया कि ‘जिस प्रयोजन हेतु मथुरा यात्रा कर रहे हो, वे सभी फल तुम्हें यहीं मिलेंगे । श्री दाउजी महाराज ने श्री कल्याण देवजी को बताया की, इसी वट-वृक्ष के नीचे मेरी एवं श्री रेवती जी की प्रतिमाएं भूमिस्थ हैं, उनका प्राकट्य करो। अब तो कल्याण-देवजी की व्यग्रता बढ गई और जुट गये भूमि के खोदने में, जिस स्थान का आदेश श्री बलराम, दाऊ जी ने किया था।
इधर एक और विचित्र आख्यान गोकुल उपस्थित हुआ कि जिस दिन श्री कल्याण-देवजी को साक्षात्कार हुआ उसी पूर्व रात्रि को गोकुल में गोस्वामी गोकुलनाथजी को स्वप्न आया कि जो श्यामा गौ (गाय) के बारे में आप चिन्तित हैं वह नित्य दूध मेरी प्रतिमा के ऊपर स्त्रवित कर देती है और जिस ग्वाले को आप दोषी मान रहे हो वो निर्दोष है। मेरी प्रतिमाएं विद्रुमवन में वट-वृक्ष के नीचे भूमिस्थ हैं उनको प्राकट्य कराओ।
यह श्यामा गौ सद्य प्रसूता होने के बावजूद दूध नहीं देती थी क्यूँकि ग्वाला जब सभी गायों को लेकर वन में चराने ले जाता थे तभी ये श्यामा गाय, एक अमुख स्थान पर जा खड़ी हो जाती थी और श्यामा गाय के थनों से स्वतः दूध उस स्थान पर गिरने लगता था। जहाँ पर श्री दाउजी और रेवती माया की मूर्तियाँ भूमिस्थ थीं इस वजह से गाय के थनों में दूध नही होता था। इसी कारण महाराज श्री को दूध के बारे में ग्वाला के ऊपर सन्देह होता था। प्रभु की आज्ञा से गोस्वामीजी ने उपर्युक्त स्थल पर जाने का निर्णय किया। वहाँ जाकर देखा कि श्री कल्याण देवजी मूर्तियुगल को भूमि से खोदकर निकाल चुके हैं। वहाँ पहुँच नमस्कार अभिवादन के उपरान्त दोनों ने अपने-अपने वृतान्त सुनाये और निश्चय किया कि इस घोर जंगल से मूर्तिद्वय को हटाकर क्यों न श्री गोकुल में प्रतिष्ठित किया जाय। कहते हैं कि चौबीस बैल और अनेक व्यक्तियों के द्वारा हटाये जाने पर भी, मूर्तिया टस से मस न हुई और इतना श्रम व्यर्थ गया। हार मानकर सभी यही निश्चय किया गया कि दोनों मूर्तियों को अपने प्राकट्य के स्थान पर ही प्रतिष्ठित कर दिया जाय। अत: जहाँ श्रीकल्याण-देव तपस्या करते थे उसी पर्णकुटी में सर्वप्रथम स्थापना हुई जिसके द्वारा कल्याण देवजी को नित्य घर में निवास करने का दिया गया ।
यह दिन संयोगत: मार्गशीर्ष मास की पूर्णमासी थी। षोडसोपचार क्रम से वेदाचार के अनुरूप दोनों मूर्तियों की अर्चना की गई तथा सर्वप्रथम श्री ठाकुरजी को खीर का भोग रखा गया, अत: उस दिन से लेकर आज तक प्रतिदिन खीर भोग में अवश्य आती है। गोस्वामी गोकुलनाथजी ने एक नवीन मंदिर के निर्माण का भार वहन करने का संकल्प लिया तथा पूजा अर्चना का भार श्रीकल्याण-देवजी ने। उस दिन से अद्यावधि कल्याण वंशज ही श्री ठाकुरजी की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। यह दिन मार्ग शीर्ष पूर्णिमा सम्वत् 1638 विक्रम था। एक वर्ष के भीतर पुन: दोनों मूर्तियों को पर्णकुटी से हटाकर श्री गोस्वामी महाराज श्री के नव-निर्मित देवालय में, जो कि सम्पूर्ण सुविधाओं से युक्त था, मार्ग शीर्ष पूर्णिमा संवत 1639 को प्रतिष्ठित कर दिया गया। यह स्थान भगवान बलराम की जन्म-स्थली एवं नित्य क्रीड़ा स्थली है पौराणिक आख्यान के अनुसार यह स्थान नन्द बाबा के अधिकार क्षेत्र में था।
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2- स्वामी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी-
संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी संस्कृत, हिंदी, ब्रजभाषा के प्रकाण्ड विद्वान तथा आध्यात्म के पुरोधा थे।
वे ‘ श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव ‘ मंत्र के द्रष्टा थे
उनके जीवन के चार संकल्प थे – दिल्ली में हनुमान जी की ४० फुट ऊंची प्रतिमा की स्थापना, राजधानी स्थित पांडवों के किले (इन्द्रप्रस्थ) में भगवान विष्णु की ६० फुट ऊंची प्रतिमा की स्थापना, गोहत्या पर प्रतिबंध तथा श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति।
संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का जन्म जनपद अलीगढ के ग्राम अहिवासीनगला में सम्वत् 1942 (सन १८८५ ई०) की कार्तिक कृष्ण अष्टमी (अहोई आठें) को परम भागवत पं॰ मेवाराम जी के पुत्र रूप में हुआ। विदुषी माता अयुध्यादेवी से संत सुलभ संस्कार प्राप्त कर आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। सम्वत् 2047 (सन 1990 ई०) की चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को भौतिक देह का त्याग वृन्दावन में कर गोलोकधाम प्रविष्ट हो गए।
अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया। फलस्वरूप उन्हें कठोर कारावास का दण्डश् भोगना पड़ा। भारत के स्वतंत्र होने पर राजनेताओं की विचारधारा से दु:खी होकर सदा के लिए राजनीति से अलग हो गए और झूसी में हंसस्कूल नामक स्थान पर वटवृक्ष के नीचे तप करने लगे। गायत्री महामंत्र का जप किया। वैराग्य भाव से हिमालय की ओर भी गए और फिर वृन्दावन आकर रहे।
श्री महाराज ब्रजभाषा के सिद्धहस्त कवि थे। उन्होंने सम्पूर्ण भागवत को महाकाव्य के रूप में छन्दों में लिखा था। “भागवत चरित‘ कोश्” ब्रजभाषा में लिखने का एकमात्र श्रेय श्री
स्वतंत्र भारत में गो-हत्या होते देखकर ब्रह्मचारी जी को बहुत दु:ख हुआ। गो-हत्या निरोध समिति बनायी गई, उसके वे अध्यक्ष बने। सन् १९६०-६१ में कश्मीर से कन्याकुमारी तक उन्होंने कई बार भ्रमण किया। सन् १९६७ में गो-हत्या के प्रश्न को लेकर उन्होंने ८० दिन तक ्व्रात किया और सरकार के विशेष आग्रह पर अपना व्रत भंग किया। वे रा. स्व. संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के भी निकट रहे। इसी बीच पं॰ जवाहरलाल नेहरू जब हिन्दू समाज विरोधी “हिन्दू कोड बिल’ लाए, तो मित्रों के प्रोत्साहन से ब्रह्मचारी जी चुनाव में खड़े हुए। आखिर नेहरू जी को हिन्दू कोड बिल को वापस लेना पड़ा। दक्षिण भारत की यात्रा के समय उन्होंने एक स्थान पर २६ फुट की हनुमान जी की प्रतिमा देखी तो वैसी ही एक विशालकाय प्रतिमा बनवाने का और उसे दिल्ली के आश्रम में दिल्ली के कोतवाल के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिया। ब्रह्मचारी जी भारतीय संस्कृति के स्तम्भ रहे। भारतीय संस्कृति व शुद्धि, महाभारत के प्राण महात्मा कर्ण, गोपालन, शिक्षा, बद्रीनाथ दर्शन, मुक्तिनाथ दर्शन, महावीर हनुमान जैसे उदात्त साहित्य की रचना की। ब्रह्मचारी जी द्वारा दिल्ली, वृन्दावन, बद्रीनाथ और प्रयाग में स्थापित संकीर्तन भवन के नाम से चार आश्रम आज भी सुचारू रूप से चल रहे हैं।
उनका संकीर्तन में अटूट लगाव था। वृन्दावन में यमुना के तट पर वंशीवट के निकट संकीर्तन भवन की स्थापना की तो प्रयाग राज प्रतिष्ठानपुर झूसीमें अनेकानेक प्रकल्पों के साथ संकीर्तन भवन प्रतिष्ठित किया।
एक बार गोरक्षाके प्रकरण पर वे वृंदावन में शासन के विरुद्घ आमरण अनशन पर बैठ गए। देश के लाखों लोग उनके साथ हो लिए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आग्रह एवं आश्वासन पर ही उन्होंने रस-पान किया था
स्वाधीनता आंदोलन में वे पं.जवाहरलाल नेहरू के साथ जेल में रहे थे। स्वाधीनता संग्राम काल में उनकी पत्रकारिता बेजोड थी। उन्होंने कई पन्नों का संपादन तथा प्रकाशन किया एवं सदैव खादी का प्रयोग किया। पूज्य ब्रह्मचारी जी ने अपने कर्म, धर्म, आचरण एवं लेखनी के द्वारा समाज को जो कुछ भी दिया वह लौकिक परिवेश में अलौकिक ही है। वे आशु कवि थे। श्रीमद्भागवत, गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि अत्यंत दुरूह ग्रंथों की सरल सुबोध हिंदी में व्याख्या कर भक्तवर गोस्वामी तुलसीदास के अनुरूप जनकल्याण कार्य किया। उन्होंने श्री भागवत को 118 भागों में जन सामान्य की सरल भाषा में प्रस्तुत किया। उनके रचित ब्रजभाषा के सुललित छन्द (छप्पय) बोधगम्यएवं गेय है, जिनका आज भी स्थान-स्थान पर वाद्य-वृंद संगति के साथ पारायण कर लोग आनंदित होते हैं। इनके अतिरिक्त नाम संकीर्तन महिमा, शुक (नाटक), भागवत कथा की वानगी, भारतीय संस्कृति एवं शुद्धि, वृंदावन माहात्म्य, राघवेंद्र चरित्र, प्रभु पूजा पद्धति, कृष्ण चरित्र, रासपंचाध्यायी, गोपीगीत, प्रभुपदावली, चैतन्य चरितावली आदि लगभग 100 अन्य आध्यात्मिक ग्रंथों का प्रणयन किया।
श्रीश्रीचैतन्य-चरितावली (SHRI-SHRI-CHAITANYA-CHARITAVALI)- प्रस्तुत पुस्तक में मात्र चार सौ वर्ष पूर्व बंगाल में भक्ति और प्रेम की अजस्र धारा प्रवाहित करने वाले कलिपावनावतार श्री चैतन्य महाप्रभु का विस्तृत जीवन-परिचय है। स्वनामधन्य परम संत श्री प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी द्वारा प्रणीत यह ग्रन्थ श्री चैतन्य देव के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र की सुन्दर परिक्रमा है।
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा रचित ब्रजभाषा के सुललित छन्द (छप्पय) बोधगम्य एवं गेय है, जिनका आज भी स्थान-स्थान पर वाद्य-वृंद संगति के साथ पारायण कर लोग आनंदित होते हैं।
निधन- संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने संवत 2047 (1990 ई.) के चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को भौतिक देह का त्याग प्रसिद्ध धार्मिक नगरी वृन्दावन, मथुरा में किया।
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3- शिवशक्ति माँ सती हरदेवी – भारत भूमि पर चमत्कार पर चमत्कार अनादि कल से ही होते आये हैं,जिसमें ब्रजभूमि का स्थान अग्रिम रहा है |
बात सन 1980 की हैं जब एक हूबहू चमत्कार हुआ था | इतना बड़ा आँखों देखा चमत्कार, शायद देश की आजादी बाद हुआ हो | ब्रज मंडल के जिला- मथुरा,तहसील -गोवर्धन थाना -बरसाना गांव-पलसों (परशुराम खेड़ा ) में एक दिव्यांगना, ‘जिनका नाम शिव शक्ति हरदेवी जी’ ने स्वयं माँ पार्वती के रूप की झलक, साधारण नर- नारियों के बीच दिखाई | वाक़या कुछ इस तरीके से है –
गांव खायरा (बरसाना के पास ) में एक ‘सौभरि ब्राह्मण’ परिवार में जन्म लिया | बचपन से ही पूजा भावना में बड़ी लग्न थी |एक साधारण परिवार में जन्म लेते हुए और अपनी साधारण छबि को दर्शाते हुए, अपने मायके में ये खबर न होने दी की कोई दिव्यशक्ति का आगमन हुआ है |धीरे धीरे समय बीतता गया और शादी लायक हुई तो घर वालो ने वर ढूढ़ना प्रारम्भ किया और इस तरीके से ग्राम पलसों में से वर का चयन कर दिया गया |शादी होने के बाद दो बच्चे और २ बच्चियां हुई और जिंदगी सब ठीक ठाक चल रही थी| समय बीतते -बीतते उनके पति जी के महामारी हो गयी अचानक उनके जीवन ने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया, मानो मुसीबतो का पहाड़ टूट पड़ा हो |उपचार कराने बाद भी वे शौहर को ना बचा सकीं |जब की अंतिम संस्कार बारी आयी तो माँ हरदेवी जी मृत शरीर को अपने गोदी में रख कर अंतिम संस्कार के लिए जाने पर अपने सती होने का मनोभाव जताने लगीं |लेकिन ये बात किसी ने स्वीकार नही की क्योंकि ‘अभी बच्चे भी छोटे छोटे हैं’ इनकी तरफ भी तो देख लो, इस तरह आसपास के लोगो ने समझाया |लेकिन वो मानने को तैयार नही हुई और अपनी अंतिम यात्रा का भूत, सभी के सामने पेश कर दिया की मैं अपने पति संग सती होउंगी |ये सुनकर सब सन्न रह गए और कोहराम बढ़ गया |लेकिन जैसे-तैसे मृत शरीर को श्मशान तक ले गए और दाह संस्कार किया |लेकिन ऊपर धड़ वाला हिस्सा जला ही नही क्योंकि जिस जगह शिवशक्ति हरदेवी जी के हाथों का स्पर्श हुआ वहाँ से वो भाग बिना जले रह गया |लोगो ने खूब जलाने की कोशिश की पर सब नाकामयाब |आखिर उस हिस्से को गंगा में विसर्जन करने के लिए लोगो ने सुझाया |उधर हरदेवी जी का मन पूरी तरह से विरक्त हो चूका था और माने नही मान रही थी |उनके इस अवस्था को देखकर जिला चिकित्सालय को ले गए |वहाँ भी वही खुमार, न कोई दवा काम करे और न ही कोई सुझाव |घटना धीरे-धीरे विकराल रूप लेता जा रही थी |जिले के बड़े-बड़े अधिकारी आ चुके थे उनके कुछ समझ नही आ रहा था | उधर गंगा गए लोगों की तरफ से सूचनाएं आती हैं कि वो “ना जला हुआ हिस्सा” बार बार गंगा के तट कि ओर आ जाता है और पानी के साथ नही बह रहा है | तो लोगों को और प्रशाशन को विश्वास हो गया कि कोई ना कोई चमत्कार तो है और उस हिस्से को बापस लाने को बोल दिया गया | | लेकिन ये भी था कि भारत में सती प्रथा का चलन बंद और गैरकानूनी हो गया था तब उस समय इस घटना के विरुद्ध प्रशाशन भी आने लगा | अंत प्रशाशन को झुकना पड़ा और हरदेवी जी को बापस पलसों गांव लेकर आगये |
गांव के निकट एक मंदिर था उसमें उन्होंने अपना ध्यान लगाया,उसी समय वही पर एक बाबा आये जो बिलकुल अजनबी थे उन्होंने हरदेवी जी को सती होने की रीति रिवाज से वाकिफ कराया | और थोड़े समय बाद ही वहाँ से अंतरध्यान हो गए |उनको साक्षात् शिव का रूप बताते हैं | फिर तो उसके बाद हरदेवी जी ने पूरी तरह श्रृंगारयुक्त होकर अपने पति के उस भाग को लेकर उसी जगह जहाँ उनके शौहर कि चिता थी वही समाधि लगाकर बैठ गयी | ये सारा कोतुहल, वहाँ के और दूर -दूर से आये हुए लोग और साथ में पुलिस प्रशाशन भी, देख रहे थेे और इस घटना के गवाह बन रहे थे | वहाँ खड़ी भीड़ से वो कुछ कहना चाह रही थी लेकिन लोग सब जय जयकार के नारे लगाने कि वजह से सुन नही पाए | देखते ही देखते अपने दोनों हाथों को रगड़ते हुए अग्नि उत्पन्न की और अग्नि धीरे -धीरे नीचे से पूरे हिस्से में पहुँचने लगी |पल भर बाद उनके बैठने की स्थिति बिचलित हुई लोगों ने बांस के सहारे उसी स्थिति में लाने की सोचते, ‘कहीं उस से पहले ही’ वह यथावत हो गयीं | फिर इसके बाद लोगों ने घी डालना शुरू कर दिया, जयकारों से सारा क्षेत्र गूंजने लगा |जिसने भी सुना वह उसी स्थिति में भाग भाग के वहाँ पहुँचने लगे | और जिस समय ये घटना हो रही थी उसी समय वहाँ जगह-जगह ” केसर” की वर्षा हुई | साक्षी बताते हैं की उस समाधि वाली जगह पर कई महीनों तक अग्नि की लौह जलती रही | आज वहीँ पर उनकी समाधि बनी हुई है और मंदिर भी | वो जगह पूजनीय हो गई वहाँ बाहर से बड़ी दूर -दूर लोग आज भी मथ्था टेकने आते हैं सन २०१२ से श्रावण मास की अष्टमी को एक मेले का आयोजन होता है | उसका जिम्मा पूरे ग्रामवासी उठाते हैं | कलियुग में चमत्कार करने वाली ऐसी मातृशक्ति, शिवशक्ति को कोटि कोटि नमन करता हूं |
:ओमन सौभरि
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सौभरि ब्राह्मण समाज की जीत की दास्ताँ : संघर्षों की कहानी-
देश की आजादी के बाद समाज के लिए कुछ ऐसे पल आये जिनमें हमने संघर्ष का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को संजोया और जीत की दावेदारी पेश की |
जो कुछ इस तरह हैं –
पहली जीत की संज्ञा समाज को तब मिली जब “भारतीय संविधान ” के अन्तर्गत वर्गीकृत ‘चार वर्गों’ में से ‘निम्न वर्ग में डाले जाने पर’, सौभरि ब्राह्मण समाज के द्वारा किये गए विरोध से पहले की तरह अपने पारम्परिक जातिसमूह, ‘ब्राह्मणत्व’ को भारतीय न्यायलय में पेशकर ,जीवंत बनाये रखा |
जीत की दूसरी दहलीज़ की हकदार वह घटना है, जब सरकार मंदिरों के privatization को खत्म कर अपने under लेने की पुरजोर कोशिश में लगी हुई थी तब “दाऊजी मंदिर, बलदेव” को भी अधिकृत करने की कोशिश की गयी आख़िरकार सरकार को वहाँ से हाथ खीचने पड़े क्योंकि सरकार के आला अफसरों को ‘दाऊ बाबा ने अपने तेज़ से अँधा’ तक कर दिया था | आज दाऊ बाबा मंदिर को वहाँ स्थित “पंडाशाही” पूरे तन,मन ,धन से संचालित करती है |
जीत का तीसरा क्षण तब आया जब समाज की संसद कही जाने वाली गोवर्धन स्थित “राधा बल्लभ कुञ्ज ” को वहाँ के अन्य अतिक्रमणकारियों द्वारा जबरन किये दावे को कोर्ट में ले जाकर बेबुनियाद साबित कर, मिसाल कायम की | ये राधाबल्लभ मंदिर, बतौर धर्मशाला राजाओंके द्वारा दी गयी धरोहर थी जो कि समाज के किसी स्वजन को दी गयी जब ये क्षेत्र भरतपुर नरेश की रियासत में आया करता था |
इस कड़ी की चौथी जीत वह थी जब हर क्षेत्र में संपन्न होते हुए भी, एक क्षेत्र में खली हुई कमी ‘राजनैतिक प्रदर्शन के सूखे को खत्म’ किया और क्षेत्र में रहने का “अपना वजूद” जनता के सामने पेश किया |
ऐसे पुरुषत्व से भरे हुए समाज का अंश होते हुए, मैं गर्व से सर उठाकर अपने पूर्वजों का जयघोष करता हूँ |
:ओमन सौभरि (भरनाकलां )
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ब्रह्मऋषि सौभरि सामाज की हलचलें-
सौभरि ब्राह्मण समाज का पुनर्जागरण काल –
इक्कीसवीं सदी का समाज, “कहां है, कैसा है, कैसा बनने वाला है, कहां पहुँचने वाला है” यह एक विशद विषय था लेकिन इस सदी ने समाज में “नवजागरण का सूत्रपात” किया | जाति संसार के आधुनिक शिक्षा से प्रभावित लोगों ने सामाजिक रचना, रीति-रिवाज व परम्पराओं को तर्क की कसौटी पर कसना आरम्भ कर स्वजनों में एक प्रबल राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया तथा यह चेतना उत्तरोत्तर बलवती होती गई और और धीरे -धीरे ये सामाजिक तथा परंपरागत सुधारों मे नियोजित हो गई। इस शिक्षा के प्रभाव में आकर ही स्वजनों ने अन्य जातिगत सभ्यता और रीति-रिवाज के बारे में ढेर सारी जानकारियाँ एकत्र कीं तथा ‘अपनी सभ्यता से अन्य समाजों क़ी तुलना’ कर सच्चाई को जाना। इन समाज सुधारकों में एक संस्था “अखिल भारतीय सौभरेय ब्राह्मण संघ ” ने अहम् भूमिका निभायी है | इसे ‘प्रगतिशील समाज के निर्माण का उद्देश्य’ के लिए सामने रखा गया, जिससे समाज में पनपी समस्याओं, अन्धविश्वासों, कुरीतियों का निराकरण होकर स्वजनों का एकीकरण जाए। फलतः इसके अन्तर्गत कृषि मे विकास, शिक्षा में प्रगति, स्वास्थ्य व पोषण में विकास, स्त्रियों की दशा में सुधार, वैवाहिक स्थिति में सुधार आदि जैसे महत्वपूर्ण कार्य हुए। यह एक समाज की वो माला है जो बीजरूपी स्वजनों को पिरोये हुए है |
निश्चित ही नई सदी में बहुत सारी चीजें काफी चमकदार दिख रहीं है। बीस साल या पचास साल पहले के मुकाबले समाज काफी आगे दिखाई दे रहा है। यहाँ पर कुछ ऐसे घटक हैं जिन्होंने पुनर्जागरण क्रांति को सफल बनाने की कोशिश की है | वैसे कृषि हमारे मूल व्यवसायों में से एक हैं,रीढ़ कि हड्डी हैं इसलिए यहाँ इसको हमने इस दौड़ में शामिल नही किया है | इसके इतर वे क्रन्तिकारी बदलाब इस तरह से हैं जिन्होंने वाकई समाज को अन्य समाजों के समक्ष कंधे से कन्धा मिलाने की असीम शक्ति दी है |
ये निम्न हैं-
1- पहला चरण – शहरों की तरफ सबसे पहले रुख करने का श्रेय, समाज में “पुरोहिती (पांडित्य कला )” को है जिसने उत्तर भारत के शहरो में अपनी जड़ें जमाई हैं जिनमें से ‘दिल्ली एनसीआर क्षेत्र’ सर्वोपरि है | बाहर आयी हुई आय (कृषि को छोड़कर)से अर्थव्यवस्था में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है | ये वो क्षेत्र है जिसमें “मंदी के दौर से पड़ने वाले प्रभाव” की कम आशंका रहती है ” | इसे पुनर्जागरण का प्रथम चरण कह सकते हैं |
2-वहीँ दूसरे चरण में – कुछ साल पहले “ट्रेक्टरबाजी का चलन” सामने आया , अगर अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखा जाय तो ये भी निश्चितरूप से क्रन्तिकारी परिवर्तनों में से एक था | इस बदलाव ने “हम व्यापार में भी माहिर हैं ” सोच को पूरी तरह परिभाषित किया |इससे पैसे की आमदनी बढ़ने से लोगो को रुझान शहर की तरफ हुआ और इससे बच्चे बाहर पढ़ने लगे और “कूपमंडूकता वाली अवधारणा “ को अपने ऊपर मर्दित किया | किंतु यह चमक-दमक कुछ खोखली मालूम होती है। इस चकाचैंध के पीछे कुछ अंधेरा बीच-बीच में सामने आता रहता है। लेकिन लोगो का मानना था कि विकास का यह रास्ता अनिवार्य रुप से दूसरे क्षेत्रो के लोगो के शोषण और संसाधनों की बेहिसाब लूट पर आधारित था । लेकिन ये हकीकतन है इस दौर में जितने बच्चे बाहर पढने निकले व् शहरों में निज निवास बने, वो अब तक का ‘तेजी से बढ़ते हुए ग्राफ’ की ओर इंगित करता है |
3-तीसरा चरण – तीसरे चरण में “अखिल भारतीय सौभरेय ब्राह्मण संघ ” की भूमिका अहम् है क्योंकि हम पैसे के साथ-साथ शहरी भी हो गए लेकिन अपनी बुनयादी जानकारियों से दूर हो गए | अपनों को अपने और अपनेपन की जागृति के लिए इस संघ ने वो किया जो आज बच्चा-बच्चा अपने कुल,गोत्र,उपगोत्र की जानकारी सेकेंडों में दे देता है वही दूसरी ओर देश के विभिन्न शहरों में रह रहे ” प्रवासी स्वजनों ” को “होली मिलन समारोह ” कार्यक्रम के सहारे एक मंच पर लाने का अविश्वसनीय काम किया |एक बात और लोग 52 गांवों का जिक्र पहले से करते आये हैं लेकिन आज स्वजन अपने १६२ से ज्यादा गॉंव(गांवों) के बारे में जान पाए हैं, वो इस संघ की ही देन है | संघ ने “मानसिक सोच बदलने में” बखूबी अपना वर्चस्व कायम किया है |
4-चौथा चरण – चौथे चरण में, शहरों में रह रहा ‘employee circle’ बृहद रूप में “समाज के विकास का झंडा” थामे हुए है | गांवों- गांवों से सैकड़ों से ज्यादा समाज में से “युवा वर्ग ” बाहर निकला हुआ है जिसने हर क्षेत्र में अपनी धाक जमाई है चाहे वो “इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, रियल स्टेट, प्रोडक्शन, गवर्नमेंट जॉब, टीचिंग, बिज़नेस” आदि | जिनमें मणिरामन् राम जी (An IAS Officer) जो कि जानी- मानी हस्ती हैं |
समय तो आगे बढ़ता जाएगा, ठीक उसी तरह हम भी उसी तरह आगे बढ़ते रहें,ऐसी शुभ आकांक्ष्याओं के साथ अपनी कलम को लगाम देता हूँ |
:ओमन सौभरि (भरनाकलां)
5-वो काली रात जब, हुआ था हमारे पूर्वजों का बहिष्कार-वृन्दावन “सौभरि ब्राह्मण समाज” का मूल निवास रहा है(सुनरख धाम ) क्योंकि हमारे वंशधर “ब्रह्मऋषि सौभरि जी” व् पूर्वजौं की तपस्थली थी | लेकिन एक घटना है जिसको सुनते ही आज भी दिल कम्पित हो उठता है, शायद हमारी युवा पीढ़ी इस “वाक़या” से अनभिज्ञ होगी | हम उसको काला दिवस नही कह सकते लेकिन वो भयंकर काली रात रही होगी| जब हमारी पांडित्यपूर्ण पराकाष्ठा चरम पर थी और ब्रज के लगभग सभी बड़े देवालयों के पुरोहित थे तब अचानक ही एक ऐसी अनहोनी हुई जिसने हमको देश के कोने -कोने में जाने को मजबूर कर दिया | वो कुछ इस तरह से है-
सन १३०० ई० के करीब बस एक छोटी सी बात नामंजूर करने पर नबाब ने, यह कह कर सौभरि ब्राह्मण समाज का बहिष्कार कर दिया, कि आप सोने की भी गाय नही काट सकते, शहर वृन्दावन को खाली करने का फरमान जारी कर दिया | जितने भी जाति संसार के पूजनीय और कर्मनिष्ठ थे उनको चिंता सताने लगी | रातों रात सलाह मशविरा किया, निष्कर्ष निकाला कि “काटने ” से “भागना ” बेहतर है और उसी क्षण अपनी जान बचाने की खातिर और अपने ‘ब्राह्मणत्व कि गरिमा’ को ध्यान रखते हुए, चलते बने | उसी रात अपने बच्चों और सामान के साथ निकल लिए |अब इतनी बड़ी तादात, जाएं तो कहाँ जाएं, बुद्धजीवियों ने सोचा जिसको जहाँ-जहाँ जगह मिलती जाय वो वहीँ ठहर ते जाओ | फिर क्या था धीरे- धीरे रथों का टोला आगे बढ़ता गया और जिसको जैसी जगह मिली वह वहीँ बसता गया | इधर सैकड़ों परिवार हाथरस, अलीगढ और बरेली की तरफ निकल गए | उधर ये घटना भरतपुर नरेश को पता चला तो उसने अपने गुप्तचरो द्वारा कुछ ठिकाने दे दिए जहाँ वो रह सकें | इस तरीके से कबीलों की तरह बसते गए | कुछ लोगो को सुदूर भेज दिया गया | उस समय एक राज्य से दूसरे राज्य में घुसने के लिए अनुमति लेनी पड़ती थी|इसलिए कुछ राजा के द्वारा बतौर शरणार्थी, कुछ रात में सीमा लांघकर , परिवारों का जिम्मा भिंड मुरैना विरासतों ने संभाला और बाकि जबलपुर की तरफ बढ़ गए |
कितनी यातनायें झेलने के बाद आज हम फिर से समृद्धि की ओर हैं |
स्वजाति आबादी – ढाई लाख से ऊपर
संत, सती, हजारों इंजीनियर्स, टीचर्स, डॉक्टर्स , pwd ठेकेदार,स्वतंत्रता सेनानी, सैनिक,पुलिस , हजारो से ज्यादा भारत सरकार के कर्मचारी, और करीब प्राथमिक रोजगार ‘खेती’ से आया हुआ करोड़ों रुपयों का टर्नओवर के मध्ये नजर अपने आसपास के इलाकों में सम्रद्धि की धाक जमाये हुए हैं |
ऐसे कर्मनिष्ठ समाज को मेरा शत शत नमन …
: ओमन सौभरि (भरनाकलां )
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समाज की ओर से जो बढावा दिया जाना चाहिए वो प्रमुख कार्य-
1-सौभरेय शूरमाओं को समय-समय पर सम्मानित करना जिन्होंने सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, साहित्य, कला, संस्कृति इत्यादि क्षेत्रों में योगदान दिया हो ।
2-10,12 कक्षा छात्रों के साथ-साथ राजकीय व केंद्रीय नौकरियों में जगह बनाने वाले बच्चों को पुरस्कृत करना ।
3-समस्त सौभरि ब्राह्मण समाज को एक वेबसाइट के जरिये सेंट्रलाइज्ड करना व वैबफॉर्म के जरिये डेटा एकत्रित करना जिसमें आने वाला नया स्वजन यूजर नाम, नम्बर, मेल आइडी,स्थान व उपगोत्र का विवरण भरे ।
4-मासिक व वार्षिक पत्रिकाओं का प्रकाशन व गांवों को छोड़कर शहरों की ओर पलायन किये हुए लोगों द्वारा होलीमिलन समारोह का आयोजन ।
5-समाज में व्याप्त कुरीतियां व रुढियों का उन्मूलन जैसे, दहेजप्रथा, बालविवाह, अशिक्षा क्योंकि अशिक्षित व रुढियों में जकड़ा हुआ समाज कभी भी विकास नहीं कर सकता ।
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अखिल भारतीय सौभरेय ब्राह्मण समाज (एक नजर में )-
समाज का मूल नाम- आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी ब्राह्मण
गौत्र- अंगिरा
उपगोत्र-50
प्रमुख पर्व-होली, दीवाली, शरदपूर्णिमा, अहोईअष्टमी, रक्षाबंधन, दशहरा, नवरात्र
गांव-162 सम्पूर्ण भारतवर्ष में
प्रसार- उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश राजस्थान
देश -भारत
महाद्वीप-एशिया
भाषा-हिन्दी, ब्रजभाषा (मूलभाषा) व अन्य भारतीय भाषाएं
विधानसभा-2
लोकसभा क्षेत्र- मथुरा 11
जनसंख्या-250000
परिवार-7000
साक्षरता-75%
धर्ममशाला ऐं- गोवर्धन,
वृन्दावन
दाऊजी के
संस्थापक : गोस्वामी कल्याण देव जी
भगवती चरित के रचयिता (ब्रजभाषा): प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी
सतीत्व: सती हरदेवी जी
माधवाचार्य जी :
सौभरि जी का तपस्थल- सुनरख, वृन्दावन
हमारी संसद : गोवर्धन कुन्ज
जनसंख्या: सम्पूर्ण भारत में 162 से ज्यादा गांव और 250000 से ज्यादा स्वजन
वृन्दावन में शोध संस्थान के लिए दी गयी भूमि
जन जन को जागरूक कराने में क्रांतिकारी योगदान: अखिल भारतीय सौभरेय संगठन
सेवायत मंदिर: दाऊजी मंदिर (बलदेव )
सेवा कुन्ज: वृन्दावन
सती हरदेवी मंदिर :पलसौं(परशुराम खेरा )
खदिरवन : खायरा
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी आश्रम :झूसी (इलाहबाद )
राजधानी: बलदेव नगरी (पंडौं की नगरी )
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Bhajan- दर्शन करने होंय तौ आ जइयो बलदेव
मिलंगे हलदेव
भर दंगे तेरी जेब
एक बार आइकैं देखौ | दर्शन करने होंय
म्हां मिलंगी रेवती रानी
जो हैं, सब ब्रज की महारानी
कीहजो, कृपा कर री
चढ़ाइयों, मिश्री
एक बार आइकैं देखौ | दर्शन करने होंय…
वहाँ मिलंगे दाऊ प्यारे
जो हैं, सब ब्रज के रखवारे
चढ़ाइयों, कुटी भांग
मनवांछित फल मांग
एक बार आइकैं देखौ | दर्शन करने होंय…
वहाँ बिराजत है क्षीरसागर
भर देगौ बू सब की गागर
लै लीजों एक बूँद
फिर मन आबे, म्हां कूद
एक बार आइकैं देखौ | दर्शन करने होंय…
तब तौ आनौ पड़ैगौ……….
तुमकूँ आनौ पड़ैगौ………..
(नवनिर्मित कृति)
ओमन सौभरि (भरनाकलां )
और अंत में हृदय रूपी लेखनी से-
आशा करते हैं कि हमारी यह पहल आपके जहन में उतरी होगी और भविष्य में भी अगले नए संस्करण में कुछ और अच्छी-अच्छी जानकारियां परोसने की कोशिश करेंगे । आप भी ऐसे ही क्रियाशील रहकर जोश और उत्साह से समाज के कार्यों में बढ़चढ़कर भागीदार बनिये । समाज के लोगों में कुछ प्रश्नों को लेकर जो उलझने थीं वो निश्चित रूप में से ही दूर हुईं होंगीं जैसे हम किस गोत्र के वंशज हैं, हमारे उपगोत्र कौन-कौनसे हैं, क्या हमारे उपगोत्रों की संज्ञा मातृवंश के आधार पर की गयी, हमारे समाज को (सौभरि ब्राह्मणों) “अहिवासी” ब्राह्मण की संज्ञा क्यों दी गयी, समाज किन-किन स्थानों पर किस अवस्था में निवास करता है, समाज को आधार देने वाले वो कौन-कौनसे व्यक्त्वि हैं। क्या-क्या सामाजिक घटनाऐं व परिवर्तन समय के साथ हुऐ ।
इस से पहले भी कई संस्थाऐं समाज में जागृति फैलाने वीणा उठती रही हैं जिनमें “अखिल भारतीय सौभरेय ब्राह्मण समाज” सबसे अग्रणी रही है जिसने “वार्षिक होलीमिलन समारोह” का आयोजन अनेक शहरी क्षेत्रों में रह रहे समाज के लोगो को जोड़कर किया ।
पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलाँ, गोवर्धन (मथुरा)







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