Saturday, June 26, 2021

सौभरि समाज के महान व्यक्तित्व

 सौभरि समाज के महान व्यक्तित्व-

1- गोस्वामी कल्याणदेव जी- 


बल्देव नगरी के संस्थापक कल्याण देव जी बड़ी ही धार्मिक और सेवा भाव वाले व्यक्ति थे । वे निष्काम भाव से ठाकुर सेवा व गोसेवा किया करते थे । उनका उपगोत्र 'तगारे' था । बाल्यावस्था बाद वो गोकुल आकर रहने लगे थे। एक ओर यह मुग़लों की स्थापना का समय था दूसरी ओर मध्ययुगीन धर्माचार्य एवं सन्तों के अवतरण तथा अभ्युदय का स्वर्णयुग। ब्रजमंडल में तत्कालीन धर्माचार्यों में महाप्रभु बल्लभाचार्य, श्री निम्बकाचार्य एवं चैतन्य संप्रदाय की मान्यताएं अत्यन्त लोकप्रिय थीं।

गोवर्धन की तलहटी में एक बहुत प्राचीनतीर्थ-स्थल सूर्यकुण्ड तटवर्तीग्राम भरना-खुर्द (छोटाभरना) था। इसी सूर्य कुण्ड के घाट पर परम सात्विक ब्राह्मण वंशावतंश गोस्वामी कल्याणदेवाचार्य तपस्या करते थे। उनका जन्म भी इसी ग्राम में अभयराम जी के घर में हुआ था। वे श्रीबलदेवजी के अनन्य अर्चक थे।


एक दिन श्री कल्याण-देवजी ने मथुरा तीर्थाटन का निश्चय कर घर से प्रस्थान कर दिया और श्री गिर्राज परिक्रमा कर के मानसी गंगा में स्नान किया इसके बाद फिर मथुरा नगरी पहुँचे, यहाँ श्री कल्याण देव जी ने श्री यमुना जी में स्नान किया और दर्शन कर आगे बढ़े और पहुँचे विद्रुमवन जहाँ आज का वर्तमान बल्देव नगर है। यहाँ रात्रि विश्राम किया। सघन वट-वृक्षों की छाया तथा यमुना जी का किनारा ये दोनों स्थितियाँ उनको भा गई। फलत: कुछ दिन यहीं तप करने का निश्चय किया।

एक दिन अपने नित्य कर्म से निवृत हुये ही थे कि दिव्य हल मूसलधारी भगवान श्री बलराम उनके सम्मुख प्रकट हुये तथा बोले कि मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, वर माँगो। कल्याण देवजी ने करबद्ध प्रणाम कर निवेदन किया कि प्रभु आपके नित्य दर्शन के अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। अत: आप नित्य मेरे घर विराजें। बलदेवजी ने तथास्तु कहकर स्वीकृति दी और अन्तर्धान हो गये। साथ ही यह भी आदेश किया कि ‘जिस प्रयोजन हेतु मथुरा यात्रा कर रहे हो, वे सभी फल तुम्हें यहीं मिलेंगे । श्री दाउजी महाराज ने श्री कल्याण देवजी को बताया की, इसी वट-वृक्ष के नीचे मेरी एवं श्री रेवती जी की प्रतिमाएं भूमिस्थ हैं, उनका प्राकट्य करो। अब तो कल्याण-देवजी की व्यग्रता बढ गई और जुट गये भूमि के खोदने में, जिस स्थान का आदेश श्री बलराम, दाऊ जी ने किया था।

इधर एक और विचित्र आख्यान गोकुल उपस्थित हुआ कि जिस दिन श्री कल्याण-देवजी को साक्षात्कार हुआ उसी पूर्व रात्रि को गोकुल में गोस्वामी गोकुलनाथजी को स्वप्न आया कि जो श्यामा गौ (गाय) के बारे में आप चिन्तित हैं वह नित्य दूध मेरी प्रतिमा के ऊपर स्त्रवित कर देती है और जिस ग्वाले को आप दोषी मान रहे हो वो निर्दोष है। मेरी प्रतिमाएं विद्रुमवन में वट-वृक्ष के नीचे भूमिस्थ हैं उनको प्राकट्य कराओ।

यह श्यामा गौ सद्य प्रसूता होने के बावजूद दूध नहीं देती थी क्यूँकि ग्वाला जब सभी गायों को लेकर वन में चराने ले जाते थे तभी ये श्यामा गाय, एक अमुख स्थान पर जा खड़ी हो जाती थी और श्यामा गाय के थनों से स्वतः दूध उस स्थान पर गिरने लगता था जहाँ पर श्री दाउजी और रेवती माया की मूर्तियाँ भूमिस्थ थीं इस वजह से गाय के थनों में दूध नही होता था। इसी कारण महाराज श्री को दूध के बारे में ग्वाला के ऊपर सन्देह होता था। प्रभु की आज्ञा से गोस्वामीजी ने उपर्युक्त स्थल पर जाने का निर्णय किया। वहाँ जाकर देखा कि श्री कल्याण देवजी मूर्तियुगल को भूमि से खोदकर निकाल चुके हैं। वहाँ पहुँच नमस्कार अभिवादन के उपरान्त दोनों ने अपने-अपने वृतान्त सुनाये और निश्चय किया कि इस घोर जंगल से मूर्तिद्वय को हटाकर क्यों न श्री गोकुल में प्रतिष्ठित किया जाय। कहते हैं कि चौबीस बैल और अनेक व्यक्तियों के द्वारा हटाये जाने पर भी, मूर्तिया टस से मस न हुई और इतना श्रम व्यर्थ गया। हार मानकर सभी यही निश्चय किया गया कि दोनों मूर्तियों को अपने प्राकट्य के स्थान पर ही प्रतिष्ठित कर दिया जाय। अत: जहाँ श्रीकल्याण-देव तपस्या करते थे उसी पर्णकुटी में सर्वप्रथम स्थापना हुई जिसके द्वारा कल्याण देवजी को नित्य घर में निवास करने का दिया गया ।

यह दिन संयोगत: मार्गशीर्ष मास की पूर्णमासी थी। षोडसोपचार क्रम से वेदाचार के अनुरूप दोनों मूर्तियों की अर्चना की गई तथा सर्वप्रथम श्री ठाकुरजी को खीर का भोग रखा गया, अत: उस दिन से लेकर आज तक प्रतिदिन खीर भोग में अवश्य आती है। गोस्वामी गोकुलनाथजी ने एक नवीन मंदिर के निर्माण का भार वहन करने का संकल्प लिया तथा पूजा अर्चना का भार श्रीकल्याण-देवजी ने। उस दिन से अद्यावधि तक श्रीकल्याण वंशज ही श्री ठाकुरजी की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। यह दिन मार्ग शीर्ष पूर्णिमा सम्वत् 1638 विक्रम था। एक वर्ष के भीतर पुन: दोनों मूर्तियों को पर्णकुटी से हटाकर श्री गोस्वामी महाराज श्री के नव-निर्मित देवालय में, जो कि सम्पूर्ण सुविधाओं से युक्त था, मार्ग शीर्ष पूर्णिमा संवत 1639 को प्रतिष्ठित कर दिया गया। यह स्थान भगवान बलराम की जन्म-स्थली एवं नित्य क्रीड़ा स्थली है पौराणिक आख्यान के अनुसार यह स्थान नन्द बाबा के अधिकार क्षेत्र में था।

****************************************

2- स्वामी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी-


images(3).jpg

संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी संस्कृत, हिंदी, ब्रजभाषा के प्रकाण्ड विद्वान तथा आध्यात्म के पुरोधा थे।
वे ‘ श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव ‘ मंत्र के द्रष्टा थे
उनके जीवन के चार संकल्प थे – दिल्ली में हनुमान जी की ४० फुट ऊंची प्रतिमा की स्थापना, राजधानी स्थित पांडवों के किले (इन्द्रप्रस्थ) में भगवान विष्णु की ६० फुट ऊंची प्रतिमा की स्थापना, गोहत्या पर प्रतिबंध तथा श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति।
संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का जन्म जनपद अलीगढ के ग्राम अहिवासीनगला में सम्वत् 1942 (सन १८८५ ई०) की कार्तिक कृष्ण अष्टमी (अहोई आठें) को परम भागवत पं॰ मेवाराम जी के पुत्र रूप में हुआ। विदुषी माता अयुध्यादेवी से संत सुलभ संस्कार प्राप्त कर आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। सम्वत् 2047 (सन 1990 ई०) की चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को भौतिक देह का त्याग वृन्दावन में कर गोलोकधाम प्रविष्ट हो गए।
अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया। फलस्वरूप उन्हें कठोर कारावास का दण्डश् भोगना पड़ा। भारत के स्वतंत्र होने पर राजनेताओं की विचारधारा से दु:खी होकर सदा के लिए राजनीति से अलग हो गए और झूसी में हंसस्कूल नामक स्थान पर वटवृक्ष के नीचे तप करने लगे। गायत्री महामंत्र का जप किया। वैराग्य भाव से हिमालय की ओर भी गए और फिर वृन्दावन आकर रहे।
श्री महाराज ब्रजभाषा के सिद्धहस्त कवि थे। उन्होंने सम्पूर्ण भागवत को महाकाव्य के रूप में छन्दों में लिखा था। “भागवत चरित‘ कोश्” ब्रजभाषा में लिखने का एकमात्र श्रेय श्री
स्वतंत्र भारत में गो-हत्या होते देखकर ब्रह्मचारी जी को बहुत दु:ख हुआ। गो-हत्या निरोध समिति बनायी गई, उसके वे अध्यक्ष बने। सन्‌ १९६०-६१ में कश्मीर से कन्याकुमारी तक उन्होंने कई बार भ्रमण किया। सन्‌ १९६७ में गो-हत्या के प्रश्न को लेकर उन्होंने ८० दिन तक ्व्रात किया और सरकार के विशेष आग्रह पर अपना व्रत भंग किया। वे रा. स्व. संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के भी निकट रहे। इसी बीच पं॰ जवाहरलाल नेहरू जब हिन्दू समाज विरोधी “हिन्दू कोड बिल’ लाए, तो मित्रों के प्रोत्साहन से ब्रह्मचारी जी चुनाव में खड़े हुए। आखिर नेहरू जी को हिन्दू कोड बिल को वापस लेना पड़ा। दक्षिण भारत की यात्रा के समय उन्होंने एक स्थान पर २६ फुट की हनुमान जी की प्रतिमा देखी तो वैसी ही एक विशालकाय प्रतिमा बनवाने का और उसे दिल्ली के आश्रम में दिल्ली के कोतवाल के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिया। ब्रह्मचारी जी भारतीय संस्कृति के स्तम्भ रहे। भारतीय संस्कृति व शुद्धि, महाभारत के प्राण महात्मा कर्ण, गोपालन, शिक्षा, बद्रीनाथ दर्शन, मुक्तिनाथ दर्शन, महावीर हनुमान जैसे उदात्त साहित्य की रचना की। ब्रह्मचारी जी द्वारा दिल्ली, वृन्दावन, बद्रीनाथ और प्रयाग में स्थापित संकीर्तन भवन के नाम से चार आश्रम आज भी सुचारू रूप से चल रहे हैं।
उनका संकीर्तन में अटूट लगाव था। वृन्दावन में यमुना के तट पर वंशीवट के निकट संकीर्तन भवन की स्थापना की तो प्रयाग राज प्रतिष्ठानपुर झूसीमें अनेकानेक प्रकल्पों के साथ संकीर्तन भवन प्रतिष्ठित किया।
एक बार गोरक्षाके प्रकरण पर वे वृंदावन में शासन के विरुद्घ आमरण अनशन पर बैठ गए। देश के लाखों लोग उनके साथ हो लिए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आग्रह एवं आश्वासन पर ही उन्होंने रस-पान किया था
स्वाधीनता आंदोलन में वे पं.जवाहरलाल नेहरू के साथ जेल में रहे थे। स्वाधीनता संग्राम काल में उनकी पत्रकारिता बेजोड थी। उन्होंने कई पन्नों का संपादन तथा प्रकाशन किया एवं सदैव खादी का प्रयोग किया। पूज्य ब्रह्मचारी जी ने अपने कर्म, धर्म, आचरण एवं लेखनी के द्वारा समाज को जो कुछ भी दिया वह लौकिक परिवेश में अलौकिक ही है। वे आशु कवि थे। श्रीमद्भागवत, गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि अत्यंत दुरूह ग्रंथों की सरल सुबोध हिंदी में व्याख्या कर भक्तवर गोस्वामी तुलसीदास के अनुरूप जनकल्याण कार्य किया। उन्होंने श्री भागवत को 118 भागों में जन सामान्य की सरल भाषा में प्रस्तुत किया। उनके रचित ब्रजभाषा के सुललित छन्द (छप्पय) बोधगम्यएवं गेय है, जिनका आज भी स्थान-स्थान पर वाद्य-वृंद संगति के साथ पारायण कर लोग आनंदित होते हैं। इनके अतिरिक्त नाम संकीर्तन महिमा, शुक (नाटक), भागवत कथा की वानगी, भारतीय संस्कृति एवं शुद्धि, वृंदावन माहात्म्य, राघवेंद्र चरित्र, प्रभु पूजा पद्धति, कृष्ण चरित्र, रासपंचाध्यायी, गोपीगीत, प्रभुपदावली, चैतन्य चरितावली आदि लगभग 100 अन्य आध्यात्मिक ग्रंथों का प्रणयन किया।

श्रीश्रीचैतन्य-चरितावली (SHRI-SHRI-CHAITANYA-CHARITAVALI)- प्रस्तुत पुस्तक में मात्र चार सौ वर्ष पूर्व बंगाल में भक्ति और प्रेम की अजस्र धारा प्रवाहित करने वाले कलिपावनावतार श्री चैतन्य महाप्रभु का विस्तृत जीवन-परिचय है। स्वनामधन्य परम संत श्री प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी द्वारा प्रणीत यह ग्रन्थ श्री चैतन्य देव के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र की सुन्दर परिक्रमा है।
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा रचित ब्रजभाषा के सुललित छन्द (छप्पय) बोधगम्य एवं गेय है, जिनका आज भी स्थान-स्थान पर वाद्य-वृंद संगति के साथ पारायण कर लोग आनंदित होते हैं।

निधन- संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने संवत 2047 (1990 ई.) के चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को भौतिक देह का त्याग प्रसिद्ध धार्मिक नगरी वृन्दावन, मथुरा में किया।

************************************
3- शिवशक्ति माँ सती हरदेवी – 

images(2)

सती अनुसूइया और माता सीता जैसा पतिव्रतधर्मी होना कलयुग में अत्यंत दुर्लभ है, यदि कोई है भी तो इनकी शक्ति उन्हीं के समतुल्य है । हमारे देश में सतीत्व को आदिकाल से ही स्त्री का आभूषण माना जाता रहा है ।

भारत भूमि पर चमत्कार पर चमत्कार अनादि कल से ही होते आये हैं,जिसमें ब्रजभूमि का स्थान अग्रिम रहा है |
बात सन 1980 की हैं जब एक हूबहू चमत्कार हुआ था | इतना बड़ा आँखों देखा चमत्कार, शायद देश की आजादी बाद हुआ हो | ब्रज मंडल के जिला- मथुरा,तहसील -गोवर्धन थाना -बरसाना गांव-पलसों (परशुराम खेड़ा ) में एक दिव्यांगना, ‘जिनका नाम शिव शक्ति हरदेवी जी’ ने स्वयं माँ पार्वती के रूप की झलक, साधारण नर- नारियों के बीच दिखाई | वाक़या कुछ इस तरीके से है –

गांव खायरा (बरसाना के पास ) में एक ‘सौभरि ब्राह्मण’ परिवार में जन्म लिया | बचपन से ही पूजा भावना में बड़ी लग्न थी |एक साधारण परिवार में जन्म लेते हुए और अपनी साधारण छबि को दर्शाते हुए, अपने मायके में ये खबर न होने दी की कोई दिव्यशक्ति का आगमन हुआ है |धीरे धीरे समय बीतता गया और शादी लायक हुई तो घर वालो ने वर ढूढ़ना प्रारम्भ किया और इस तरीके से ग्राम पलसों में से वर का चयन कर दिया गया |शादी होने के बाद दो बच्चे और २ बच्चियां हुई और जिंदगी सब ठीक ठाक चल रही थी| समय बीतते -बीतते उनके पति जी के महामारी हो गयी अचानक उनके जीवन ने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया, मानो मुसीबतो का पहाड़ टूट पड़ा हो |उपचार कराने बाद भी वे शौहर को ना बचा सकीं |जब की अंतिम संस्कार बारी आयी तो माँ हरदेवी जी मृत शरीर को अपने गोदी में रख कर अंतिम संस्कार के लिए जाने पर अपने सती होने का मनोभाव जताने लगीं |लेकिन ये बात किसी ने स्वीकार नही की क्योंकि ‘अभी बच्चे भी छोटे छोटे हैं’ इनकी तरफ भी तो देख लो, इस तरह आसपास के लोगो ने समझाया |लेकिन वो मानने को तैयार नही हुई और अपनी अंतिम यात्रा का भूत, सभी के सामने पेश कर दिया की मैं अपने पति संग सती होउंगी |ये सुनकर सब सन्न रह गए और कोहराम बढ़ गया |लेकिन जैसे-तैसे मृत शरीर को श्मशान तक ले गए और दाह संस्कार किया |लेकिन ऊपर धड़ वाला हिस्सा जला ही नही क्योंकि जिस जगह शिवशक्ति हरदेवी जी के हाथों का स्पर्श हुआ वहाँ से वो भाग बिना जले रह गया |लोगो ने खूब जलाने की कोशिश की पर सब नाकामयाब |आखिर उस हिस्से को गंगा में विसर्जन करने के लिए लोगो ने सुझाया |उधर हरदेवी जी का मन पूरी तरह से विरक्त हो चूका था और माने नही मान रही थी |उनके इस अवस्था को देखकर जिला चिकित्सालय को ले गए |वहाँ भी वही खुमार, न कोई दवा काम करे और न ही कोई सुझाव |घटना धीरे-धीरे विकराल रूप लेता जा रही थी |जिले के बड़े-बड़े अधिकारी आ चुके थे उनके कुछ समझ नही आ रहा था | उधर गंगा गए लोगों की तरफ से सूचनाएं आती हैं कि वो “ना जला हुआ हिस्सा” बार बार गंगा के तट कि ओर आ जाता है और पानी के साथ नही बह रहा है | तो लोगों को और प्रशाशन को विश्वास हो गया कि कोई ना कोई चमत्कार तो है और उस हिस्से को बापस लाने को बोल दिया गया | | लेकिन ये भी था कि भारत में सती प्रथा का चलन बंद और गैरकानूनी हो गया था तब उस समय इस घटना के विरुद्ध प्रशाशन भी आने लगा | अंत प्रशाशन को झुकना पड़ा और हरदेवी जी को बापस पलसों गांव लेकर आगये |
गांव के निकट एक मंदिर था उसमें उन्होंने अपना ध्यान लगाया,उसी समय वही पर एक बाबा आये जो बिलकुल अजनबी थे उन्होंने हरदेवी जी को सती होने की रीति रिवाज से वाकिफ कराया | और थोड़े समय बाद ही वहाँ से अंतरध्यान हो गए |उनको साक्षात् शिव का रूप बताते हैं | फिर तो उसके बाद हरदेवी जी ने पूरी तरह श्रृंगारयुक्त होकर अपने पति के उस भाग को लेकर उसी जगह जहाँ उनके शौहर कि चिता थी वही समाधि लगाकर बैठ गयी | ये सारा कोतुहल, वहाँ के और दूर -दूर से आये हुए लोग और साथ में पुलिस प्रशाशन भी, देख रहे थेे और इस घटना के गवाह बन रहे थे | वहाँ खड़ी भीड़ से वो कुछ कहना चाह रही थी लेकिन लोग सब जय जयकार के नारे लगाने कि वजह से सुन नही पाए | देखते ही देखते अपने दोनों हाथों को रगड़ते हुए अग्नि उत्पन्न की और अग्नि धीरे -धीरे नीचे से पूरे हिस्से में पहुँचने लगी |पल भर बाद उनके बैठने की स्थिति बिचलित हुई लोगों ने बांस के सहारे उसी स्थिति में लाने की सोचते, ‘कहीं उस से पहले ही’ वह यथावत हो गयीं | फिर इसके बाद लोगों ने घी डालना शुरू कर दिया, जयकारों से सारा क्षेत्र गूंजने लगा |जिसने भी सुना वह उसी स्थिति में भाग भाग के वहाँ पहुँचने लगे | और जिस समय ये घटना हो रही थी उसी समय वहाँ जगह-जगह ” केसर” की वर्षा हुई | साक्षी बताते हैं की उस समाधि वाली जगह पर कई महीनों तक अग्नि की लौह जलती रही | आज वहीँ पर उनकी समाधि बनी हुई है और मंदिर भी | वो जगह पूजनीय हो गई वहाँ बाहर से बड़ी दूर -दूर लोग आज भी मथ्था टेकने आते हैं सन २०१२ से श्रावण मास की अष्टमी को एक मेले का आयोजन होता है | उसका जिम्मा पूरे ग्रामवासी उठाते हैं | कलियुग में चमत्कार करने वाली ऐसी मातृशक्ति, शिवशक्ति को कोटि कोटि नमन करता हूं |

4- माधवाचार्य जी- 


  ब्रिटिशराज में मंदिर को इसके साथ ही एक धक्का तब लगा जब ग्राउस मथुरा का कलेक्टर नियुक्त हुआ। ग्राउस  का विचार था कि बलदेव जैसे प्रभावशाली स्थान पर एक चर्च का निर्माण कराया जाय क्योंकि बलदेव उस समय एक मूर्धन्य तीर्थ स्थल था। अत: उसने मंदिर की बिना आज्ञा के चर्च निर्माण प्रारम्भ कर दिया। शाही जमाने से ही मंदिर की 256 एकड़ भूमि में मंदिर की आज्ञा के बगैर कोई व्यक्ति किसी प्रकार का निर्माण नहीं करा सकता था क्योंकि उपर्युक्त भूमि के मालिक जमींदार श्री दाऊजी हैं तो उनकी आज्ञा के बिना कोई निर्माण कैसे हो सकता था? परन्तु उन्मादी ग्राउस ने बिना कोई परवाह किये निर्माण कराना शुरू कर दिया।


 मंदिर के मालिकान श्री दाउजी जी महाराज की कृपा से उसे बलपूर्वक ध्वस्त करा दिया जिससे चिढ़-कर ग्राउस ने पंडावर्ग एवं अन्य निवासियों को भारी आतंकित किया ग्राउस ने हमारे समाज को निम्न श्रेणी में डाल दिया था

मंदिर मालिकान ने आगरा के एक मूर्धन्य सेठ एवं महाराज मुरसान के व्यक्तिगत प्रभाव का प्रयोग कर वायसराय से भेंट की और ग्राउस का स्थानान्तरण बुलन्दशहर कराया । जिस स्थान पर चर्च का निर्माण कराने की ग्राउस की हठ थीं उसी स्थान पर आज वहाँ बेसिक प्राइमरी पाठशाला है जो पश्चिमी स्कूल के नाम से जानी जाती है यह ग्राउस की पराजय का मूक साक्षी है।
  उसी ग्राउस के किये हुए कुकृत्य के विरुद्ध अपना गौरव पुनः प्राप्त करने के लिए विद्वान व स्वसमाज के शुभचिंतक श्री माधवाचार्य जी ने माननीय सुप्रीमकोर्ट में जाकर चुनौती दी थी और साक्ष्य दिये और अंत में अपने स्वसमाज की विजय हुई।
 ब्राह्मणत्व को बरकरार रखते हुए ग्राउस का विरोध किया क्योंकि ग्राउस ने जनरल कैटगरी से समाज को  सिड्यूल कास्ट में डालने की भरसक कोशिश की लेकिन इस के लिए माधवाचार्य जी ने अभूतपूर्व, अतुलनीय व प्रशंशनीय काम किया और समाज को जनरल कैटेगिरी में बने रहने के लिए अड़े रहे, उनके योगदान को स्वसमाज कभी भुला नहीं पायेगा ।
स्वसमाज को फिर से सामान्य कैटेगिरी में लाने में इस महान विभूति ने बडे ही गौरव का काम किया । ऐसे स्वसमाज के व्यक्तित्व को हृदय से हाथ जोड़कर नमन करता हूँ ।

5-प्रसिद्ध चित्रकार पं. जगन्नाथ मुरलीधर अहिवासी:-
इनका जन्म 1901 में ब्रज मंडल के पवित्र स्थल गोकुल में प्रतिष्ठित आदिगौड़ अहिवासी ब्राह्मण  परिवार में हुआ था । इनके पिता पं. मुरलीधर अहिवासी अपने समय के प्रसिद्ध कथावाचक एवं भजनगायक थे ।

1926 में आपने जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स, मुंबई से चित्रकला मे शिक्षा प्राप्त की । इसके बाद इसी संस्था में आपको शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। 1956 में सेवानिवृत्त होने तक आप इस संस्था में चित्रकारी विभाग के प्रमुख रहे । 1935 में आपको 'जी. सुलोमोन पदक' से सम्मानित किया गया था । भारतीय चित्रकला में आपके उल्लेखनीय कार्य के लिए "ललित कला अकादमी नई दिल्ली" ने आपको स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था।

चित्रकला पर आपने पुस्तक भी लिखी जिनमें "रेखांजली" प्रमुख है, इस पुस्तक को  बी.जी. नवलखी द्वारा 1961 में  प्रकाशित किया गया। आपने नई दिल्ली, सचिवालय में भी भित्तिचित्र निष्पादित किये तथा आधुनिक भारतीय कला में आपके योगदान के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आपकी बहुत प्रशंसा की थी ।

आपके द्वारा बनाए गए चित्र विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित है, जिनमे जहाँगीर आर्ट गैलेरी, बॉम्बे और लन्दन, अमेरिका  की आर्ट गैलेरी प्रमुख हैं । 1941 में बच्चों के खेल विषय पर भारतीय समकालीन शैली में आपने  केवल स्याही का प्रयोग कर कलाकृति बनाई थी जिसका शीर्षक था "चूहा और बिल्ली" जो कि बॉम्बे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स के संग्रह में उपलब्ध है ।

आपकी कुछ प्रसिद्ध कृतियों में  " संदेश ", "सुभद्रा और अर्जुन ", "मीरा का प्रस्थान " आदि प्रमुख  है जो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने चीन के प्रधानमंत्री चाउ. एन. लाइ को उनकी भारत यात्रा के अवसर पर भेंट की थी । 1956 से 1970 तक आप  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में "ललित कला विभाग" में प्रशिक्षक तथा भारत कला भवन के प्रबंधक रहे ।

आपने 29 दिसम्बर 1973 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थित अपने ही निवास स्थल पर आपने इस धरती लोक को छोड़ परमधाम को गमन किया। लम्बे कद, गौर वर्ण, सरल स्वभाव, सदा हँसमुख चेहरा, अपने छात्रों के बीच लोकप्रिय और सदा चित्रकारिता में व्यस्त रहना, ये आपकी विशेषता रही ।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित दृश्य कला संकाय में दो नई कला दीर्घाओं दीर्घाएं जिसमें पहली महामना मालवीय व दूसरी संकाय के पहले पं. आचार्य जगन्नाथ मुरलीधर अहिवासी के नाम से खोली गई हैं।



:ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

संबंधित लिंक...