Saturday, June 26, 2021

तहसील छाता, गोवर्धन, मथुरा (उत्तरप्रदेश) के यमुना के पश्चिम दिशा वाले 12 गाँवों का विवरण

 तहसील छाता, गोवर्धन, मथुरा (उत्तरप्रदेश) के यमुना के पश्चिम दिशा वाले 12 गाँवों का विवरण-

1.भरनाकलां-

मूल नाम- भरनाकलां
ब्लॉक- चौमुहाँ
थाना-बरसाना
जिला- मथुरा
संभाग/मंडल- आगरा
प्रदेश- उत्तरप्रदेश
देश -भारत
महाद्वीप-एशिया
भाषा-हिन्दी
मानक समय-IST(UTC+5:30)
समुद्र तल से ऊँचाई-184
दूरभाष कोड़- 05662
विधानसभा क्षेत्र- छाता
तहसील-गोवर्धन
लोकसभा क्षेत्र- मथुरा
जनसंख्या-4500
परिवार-450
साक्षरता-75%
स्कूल/कॉलेज- सरस्वती शिशु मंदिर, प्राइमरी विद्यालय, कैप्टन राकेश इंटर कॉलेज
बैंक- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
हॉस्पिटल-गवरमेंट अस्पताल
मंदिर-बाँके विहारी मंदिर
बाजार-शनि बाजार

विश्व के अन्य सभी देशों की तुलना में “भारत” वास्तव में आज भी गांवों का ही देश है। कला, संस्कृति, वेशभूषा के आधार पर आज भी ‘गांव’ देश की रीढ़ की हड्डी बने हुये हैं। प्रत्येक गांव का एक अपना ही महत्व होता है जिसका पता वहां रहने वाला ही जानता है। गांव में चक्की के मधुर गीत से ही सवेरा आरंभ होता है।

मेरा गांव भरनाकलां भी भारत के लाखों गांवों जैसा ही है । लगभग साढ़े चार सौ घरों की इस बस्ती का नाम भरनाकलां है !भरनाकलां गांव छाता-गोवर्धन रोड पर स्थित है । गांव के पूर्व में भरनाखुर्द, पश्चिम में ततारपुर, उत्तर में सहार, दक्षिण में पाली गांव स्थित है । गांव में खाद गोदाम भी है ।

गांव के तीनौं तरफ प्रमुख तालाब हैं इसके पूर्व में श्यामकुण्ड, पश्चिम में नधा एवं दक्षिण में मुहारी(मुहारवन) है ।

लोग हर क्षेत्र में कार्य करने में सक्षम होते जा रहे हैं।गांव में बारात के ठहरने के लिए बारात घर की भी व्यवस्था है ।  पीने के स्वच्छ जल की व्यवस्था गांववासियों ने बिना सरकार की सहायता लिए बगैर,स्वयं यहाँ के लोगों व्यवस्थित की गई है ।

अगर हम गांव की आबादी स्वसमाज के अनुसार देखते हैं तो करीब 50 प्रतिशत से ज्यादा की भागेदारी है और अगर अपने समाज के गोत्र के हिसाब से यहाँ, वर्गला, ईटोंइयाँ, कुम्हेरिया, पचौरी, भुर्र्क, तगर, परसैया आदि परिवार मिलते हैं । गाँव के उत्तर में कलकल करती हुई आगरा नहर बहती है । चारों और खेतों की हरियाली गाँव की शोभा बढ़ाती है । पूर्व और दक्षिण में भरतपुर फीडर(बम्बा)और पश्चिम में खार्ज बम्बा कृषि सिंचाई की पूर्ति करता है। गाँव से थोड़ी दूरी पर एक बड़ा सा बाँके विहारी जी का मंदिर है जिसके पास मुहारवन तालाब है । पाठशाला और अस्पताल गाँव के बाहर है । गाँव के सभी वर्णों के लोग यहाँ रहते हैं ।
गाँव में अधिकतर किसान रहते है ।मेरे गाँव में गेंहू, चना, मक्का,ज्वार, चावल, सरसों एवं गन्ने की उपज होती है । कुछ लोग भांग, तंबाखू का सेवन भी करते हैं अन्य जगहों की तुलना करने पर फिर भी मेरा गाँव अपने आप में अच्छा हैं । यहाँ प्रकर्ति की शोभा है, स्नेहभरे लोग हैं, धर्म की भावना है और मनुष्यता का प्रकाश है । रोजगार की वजह से दिल्ली की तरफ लोगों का पलायन बड़ी मात्रा में हो रहा है ।

हमारे गांव में जो आगरा नहर है वह नहर नहीं उसे ‘जीवन की धारा’ कहिए, क्योंकि जहाँ-जहाँ भी वह पहुंची है, सूखे खेतों में नया जीवन लहलहा उठा है। बंजर भूमि भी सोना उगलने लगी है। जब हम घर-द्वार से दूर किसी नगर में या वहां से भी दूर परदेश में होते हैं तो भी अपना गांव स्वप्न बनकर हमारे ह्रदय में समाया रहता है। रह-रहकर उसका स्मरण तन मन में उत्तेजना भरता रहता है।

यहाँ की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या गांवों में रहती है |आधे से अधिक लोगों का जीवन खेती पर निर्भर है इसलिए ‘गांवों के विकास’ के बिना देश का विकास किया जा सकता है, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता | गाँव के अंदर ही बैंक, एटीएम व डाकघर स्थित है। यहाँ पक्की सड़कें एवं बिजली की उत्तम उचित व्यवस्था है ।

होली, दीवाली, रक्षाबंधन, दशहरा , शरद पूर्णिमा बडे धूमधाम से मनाये जाते हैं विशेषकर होली का त्यौहार बड़े ही हर्ष-उल्लास के साथ सब ग्रामवासी मनाते हैं । रंगवाली होली जिसे धुलैंडी बोलते हैं उसी दिन गाँव का मेला होता है । मेले वाले दिन सभी नाते- रिश्तेदार अपने-अपने रिश्तेदारों के यहाँ आते हैं । उस दिन गांव में दिन निकलते ही होली का खेल शुरू हो जाता है ।सब लोग हाथों में रंग, गुलाल लिए घरों से बाहर निकल कर सभी लोगों को रंग लगाते हैं और DJ और बाजे के साथ गांव की पूरी परिक्रमा करते हैं । ये एक जुलूस की तरह होता है । ये जुलूस होली के उत्सव में चार चांद लगा देता है । यह एकता का प्रतीक है । इसमें सभी धर्म-जाति के लोग होते हैं ।

क्षेत्रफल के हिसाब से वैसे गांव ‘तीन थोक’ में बँटा हुआ है, मेले की फेरी की शुरुआत 10 विसा के रामलीला स्थान से होती है । इसके बाद फेरी ‘पौठा चौक’से होते हुए ‘कुम्हरघड़ा हवा’की ओर बढ़ती है । इसके बाद 2.5 विसा की तरफ बढ़ते हैं जो कि ‘ईटोइयाँ परिवारों’ को रंग लगाते हुए आगे बढ़ते हुए शोभाराम प्रधान जी के घर के सामने लोग भांग का भोग लेते हैं ।

विश्राम लेने के बाद आगे बढ़ते हुए ‘कुम्हेरिया परिवारों’ की तरफ होते हुए 1.25 विसा में प्रवेश करते हैं, यहीं एक छोटा सा मंदिर भी है, सब लोग ठाकुर जी को रंग लगाते हैं । यहाँ आकर सारे ग्रामवासी ‘तीनों थोकौं’ इक्ट्ठे हो जाते हैं ।इस तरह से लोग धीरे -धीरे आगे रामलीला स्थान की तरफ ‘सेलवालों’ की पौरी से होते हुए चलते हैं ।
यहाँ से रास्ता थोड़ा सँकरा है इसलिए DJ वाली गाड़ी को निचले परिक्रमा मार्ग से निकालते हैं ।

इसके बाद फेरी का प्रवेश फिर से 10 विसे में होता है और रामलीला में मैदान पर आकर इस रंगवाली होली का समापन क़रते हैं । सब लोग अपने-अपने घरों को चले जाते हैं और नहा-धोकर दोपहर से लगने वाले मेले की तैयारी करते हैं । सब के यहाँ पर 12 बजे के बाद रिश्तेदार आने लगते हैं । चारों तरफ खुशियों का नजारा होता है ।

शाम को करीब 3 बजे से ‘ भरनाकलां काली कमेटी’ की तरफ से ‘काली’, पट्टेबाजी, घायल प्रदर्शनी व अलग-अलग अनौखी झाकियां निकाली जाती है । सुबह वाली ‘होली की फेरी’ की तरह ही इसे पूरे गांव में होकर निकालते हैं ।

6:30 बजे शाम तक इसका समापन उसी रामलीला स्थान पर आकर हो जाता है ।फिर से सब अपने -अपने घर चले जाते हैं और अतिथियों की आवभगत करते हैं । पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का भी बराबर योगदान इस दिन रहता है । वह सुबह से आने वाले सगे संबंधियों के लिए व्यंजनों की व्यवस्था करती हैं ।

इसके बाद करीब 11 बजे से रात को लोकनृत्य, नौटंकी, रसिया दंगल आदि का प्रोग्राम सुबह 4 बजे तक होता है । इस तरह से हर साल यही परंपरा सदियों से चली आ रही है ।

इसी तरह से ब्रज के अन्य गॉंवों में क्रमवार होली के मेले के आयोजन होते हैं । इसी तर्ज पर होली पर आपस मिलने के बहाने घर छोड़कर रह रहे शहरों में रहनेवाले अपनी समाज के लोग प्रतिवर्ष मात्र, नोएडा, ग्वालियर इत्यादि जगहों पर ‘होली मिलन’ समारोह क़रते हैं ।

2.भरनाखुर्द-

भरनाखुर्द गांव आगरा नहर की तलहटी में बसा हुआ है । गांव में ब्रजक्षेत्र का सबसे बड़ा कुंड ‘सूरजकुण्ड’ इसी गांव में स्थित है । आधे से ज्यादा गांव टीले पर बसा हुआ है ।
गांव में 80%आबादी स्वजनों (सौभरी ब्राह्मण समाज) की है । गांव के प्रवेश द्वार के पास बच्चों की शिक्षा के लिए महर्षि सौभरि इंटरकॉलेज बना हुआ है ।

यह भूमि गोस्वामी कल्याणदेव जी की जन्मस्थली है जिनकी तपस्या से स्वयं ‘ब्रज के राजा कृष्ण के बड़े भ्राता’श्री बलदाऊ जी’ की मूर्ति स्वप्न में दिखी थी और इसके बाद ‘श्री दाऊजी मंदिर(बलदेव)’ का निर्माण कराया । यह स्थान मथुरा से 14KM दूर मथुरा-सादाबाद रोड पर स्थित है ।

आज उन्ही के प्रभाव से नए गांव’ दाऊजी’ की स्थापना हुई जहाँ उनके वंशज “दाउजी के मंदिर’ के पंडे-पुजारी हैं । यहाँ पर सम्पूर्ण देश-विदेशों से यजमान व दर्शनार्थी ‘रेवती मैया व दाउ बाबा के दर्शन करने आते हैं ।

सूरजकुण्ड होने की वजह से भरनाखुर्द गांव के निवासियों में सूर्य की तरह तेजवान व गर्मजोशी वाले हैं । इस गांव का मेला धुलैंडी के बाद चैत्र कृष्ण द्वितीया को मनाया जाता है । संयोगवश दाउजी का हुरंगा भी द्वितीया को ही मनाया जाता है ।

3.पेलखू-

पेलखू गांव भरनाकलां से 5 KM की दूरी पर स्थित है । यह गांव गोवर्धन तहसील के अन्तर्गत आता है । यहाँ पर स्वसमाज के अलावा गुर्जर भी बड़ी मात्रा में निवास करते हैं । स्वसमाज के अगर गोत्रों की बात की जाय तो “पधान पचौरी” व “भुर्रक” उपगोत्रों की बहुलता है ।करीब पूरे गांव में 500 घर के आसपास हैं जिनमें आधे स्वसौभरी जनों के हैं ।

अपने 12 गांव जो तहसील छाता और गोवर्धन के अंतर्गत आते हैं उनमें ‘पेलखू’ गांव ने शान्ति की मिसाल कायम की हैं क्योंकि स्वजनों के अलावा ‘गुर्जर’ भारी मात्रा में हैं । गांव पेलखू के पश्चिम में भरनाखुर्द, पूर्व में राल, उत्तर में शिवाल व दक्षिण में
कोनई गांव पड़ता है ।

4.मघेरा-

गांव मघेरा गोवर्धन-वृन्दावन मार्ग पर स्थित है । 12 गॉंवों से इकलौता गांव है जो कि मथुरा तहसील में आता है । गांव की सीमाएं गांव अझही, गांव राल, छटीकरा व गांव भरतिया से लगी हुई हैं । मघेरा गांव में स्वजन सौभरि ब्राह्मण समाज का बोलबाला है ।

उपगोत्र के हिसाब से ‘भुर्रक गोत्र’ बड़ी बहुलता में मिलता है । वो इस गांव के ‘भूमियां’ हैं जहाँ भी भुर्रक गोत्री अन्य गॉंवों व शहरों में रहते हैं वो सब यही के ‘मूल निवासी’ हैं । ज्यादातर यहाँ के लोग शहरों में निकले हुये हैं । अपने 12 गांवों की तुलना में यहाँ के निवासी सबसे ज्यादा ‘शहरी’ हैं ।

साक्षरता का जो अनुपात है, उसमें भी यह गांव अव्वल है । गांव का मेला को मनाया जाता है ।

5-पलसों-

पलसों गाँव सती स्वरूपा ‘श्री हरदेवी जी’ की कर्मस्थली व पुण्यस्थली है । यह गोवर्धन-बरसाना रोड़ पर स्थित गांव पलसों ‘परशुराम खेड़ा’ के नाम से भी जाना जाता है । शुरुआत से इस पावन गांव से बड़े-बड़े पहलवान होते रहे हैं । वर्तमान में तहसील गोवर्धन व छाता में पड़ने वाले सौभरि ब्राह्मण समाज के गांवों में जनसंख्या व क्षेत्रफल के हिसाब से दूसरे स्थान पर है ।

आसपास के गाँव जैसे, मडोरा, महरौली, भगोसा, डिरावली, छोटे नगले पलसों गांव की सीमा से लगे हुए हैं । गांव में उपगोत्रों के हिसाब से ‘परसईयाँ’ गोत्र बहुलता में पाया जाता है । 
गांव के समीप ही गोवर्धन- बरसाना सड़कमार्ग पर ‘श्री हरदेवी जी ‘ का मन्दिर बना हुआ है । पलसों एक बर्ष अंदर दो मेलों का आयोजन कराने वाला इकलौता स्वजातीय गांव है । होली के मेले का आयोजन चैत्र कृष्ण तृतीया को तथा ‘श्री सती हरदेवी जी’ का मेला श्रावण मास की शुक्ल अष्टमी को होता है ।

गांव के प्रवेशद्वार स्थित श्री शंकर इंटर कॉलेज आज भी शिक्षा के मामले में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है ।
गांव के पास ही पेट्रोल पंप व बैंक भी है जो लोगों जनसुविधा के हिसाब से आदर्श गांव की ओर इंगित करता है । गांव के बाहर चारागाहों की तरह पशुओं के बैठने का भी पूरा इंतज़ाम है जिसे ‘राहमीन’ कहते हैं ।

एक वृतांत के अनुसार परसों अथवा पलसों नामक गाँव गोवर्धन-बरसाना के रास्ते में स्थित है। ब्रजमण्डल स्थित भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों में से यह एक है। जब अक्रूर जी, बलराम और कृष्ण दोनों भाईयों को मथुरा ले जा रहे थे, तब रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण ने गोपियों की विरह दशा से व्याकुल होकर उनको यह संदेश भेजा कि मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि परसों यहाँ अवश्य ही लौट आऊँगा तब से इस गाँव का नाम परसों हो गया।

6.सीह-

गांव सीह भी पलसों गांव से 2 KM दूर बरसाने की तरफ गोवर्धन-बरसाना रोड़ पर स्थित है ।
जैसा कि गांव का नाम है उसी से ज्ञात होता है कि यहाँ “सीहइयाँ’ उपगोत्र के लोग ‘भूमियां’ का ताज लिए हुए हैं । दो तिहाई लोग ‘सीहइयाँ’ उपगोत्र के हैं व इनके बाद उपगोत्र ‘सिरौलिया’ आते हैं ।
गांव में होली के मेले का आयोजन चैत्र कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है

सबसे ज्यादा स्वजन ‘पुरोहिताई’ में इसी गांव से निकल कर देश के सभी हिस्सों में अपनी’ब्राह्मण कला संस्कृति’ का परिचय दे रहे हैं । गांव की सीमाएं पलसों, डिरावली, देवपुरा, डाहरौली, हाथिया गांव से सटी हुईं हैं ।

7.डाहरौली-

गांव डाहरौली गोवर्धन-बरसाना रोड़ पर स्थित है ।
जनसंख्या के हिसाब से छोटा गांव है । सीह की तरह ही पुरोहिताई में यह गांव भी अग्रणी है ।
राधारानी की जन्मस्थली बरसाना के बिल्कुल निकट है।

अन्य गांवों की तुलना में सीह, पलसों, डाहरौली तीनौं गांवों में हल्की से राजस्थान की झलक देखने को मिलती है । यहाँ जलस्तर थोड़ा नीचा है ।
होलीदहन से एक दिन पहले फ़ाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को गांव के मेले का आयोजन होता है ।

8. भदावल-

गांव भदावल छाता–बरसाना रोड पर स्थित है । भदावल गांव की सीमाएं तहसील छाता, नगरिया, खानपुर आदि गांवों से लगी हुई है। होली पर मनाया जाने वाला मेला धुलैंडी (रंगवाली होली) के दिन होता है ।
आगरा नहर की तलहटी में बसा हुआ है ।

9.खानपुर-

खानपुर गांव छाता तहसील से 2 KM की दूरी पर बसा हुआ छोटा गांव है ।

गांव की स्थति अतीत में थोडी कमजोर थी लेकिन वर्तमान में अन्य स्वजातीय गांवों को विकास के मामले में कड़ी टक्कर दे रहा है।
लगभग सभी गांववासियों ने छाता में प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट किया हुआ है ।

कृषि के अलावा ट्रैक्टरों का बिजनैस भी विकास को नया आयाम देता है ।
इसकी गांव की 5 गांवों में होती है और वो गांव हैं खायरा, भदावल, नगरिया, खानपुर, बिजवारी ।
गांव के मेले का आयोजन …..

10.नगरिया-

नगरिया गांव भी आगरा नहर से थोड़ा आगे छाता-बरसाना मार्ग पर स्थित है ।
उपगोत्रों के हिसाब से ‘दुरकी’ उपगोत्र के लोग यहाँ बहुसंख्यक हैं । जनसंख्या के लिहाज से यह 12 गांवों में सबसे छोटा गांव है ।

लेकिन कृषि के मामले में यह गांव सभी गाँवों से ऊपर है । होली पर मनाया जाने मेला….

11.-बिजवारी-

बिजवारी गांव बरसाना-नंदगांव मार्ग पर स्थित है ।
मुख्य रोड़ से आपको करीब 3 KM चलना पड़ता है गांव की ओर । यह भी छोटा सा गांव है और “रौसरिया उपगोत्री” यहाँ के भूमियां हैं ।
गांव के पास में ही बहुत मनोहर तालाब है ।
बिजवारी गांव की सीमाएं गांव खायरा, नन्दगांव आदि गांवों से लगी हुई हैं ।
होली के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले मेलों में बिजवारी का मेला सबसे पहले फाल्गुन शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है जिसे ‘बिजवारी छठ मेला’ के नाम से भी पुकारते हैं ।
वृतांत के अनुसार बिजवारी नन्दगाँव से डेढ़ मील दक्षिण-पूर्व तथा खायरा गाँव से एक मील दक्षिण में स्थित है। इस स्थान का श्रीकृष्ण तथा बलराम से घनिष्ठ सम्बंध है। प्रसंग जब अक्रूर जी, बलराम और कृष्ण दोनों भाईयों को मथुरा ले जा रहे थे, तब यहीं पर दोनों भाई रथ पर बैठे थे। उनके विरह में गोपियाँ व्याकुल होकर एक ही साथ “हे प्राणनाथ!” ऐसा कहकर मूर्च्छित होकर भूतल पर गिर गईं। उस समय सब को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो आकाश से विद्युतपुञ्ज गिर रहा हो। विद्युतपुञ्ज का अपभ्रंश शब्द ‘बिजवारी’ है। अक्रूर जी दोनों भाईयों को लेकर बिजवारी से पिसाई, सहार तथा जैंत आदि गाँवों से होकर अक्रूर घाट पहुँचे और वहाँ स्नान कर मथुरा पहुँचे। बिजवारी और नन्दगाँव के बीच में अक्रूर स्थान है, जहाँ शिलाखण्ड के ऊपर श्रीकृष्ण के चरण चिह्न हैं। सौभरि जी के मंदिर के जो महंत हैं वो उन्ही के वंशज “सौभरेय ब्राह्मण” ही हैं ।

12-खायरा गाँव-(सौभरेय ब्राह्मण समाज का सबसे बृहदगाँव)-

खायरा गाँव-(सौभरेय ब्राह्मण समाज का सबसे बृहदगाँव)-

गांव खायरा छाता-बरसाना मार्ग पर स्थित है । यह स्वजाति सौभरि ब्राह्मण समाज व अपने इस क्षेत्र का सब से बड़ा तख्त गॉंव है । इस गांव ने “12 गांवों की राजधानी” के नाम से प्रसिद्धी पायी हुई है । लगभग 12000 की जनसंख्या वाले इस गांव में होली के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला मेला ब्रज की अंतिम होली के दिन चैत्र कृष्ण पंचमी को मनाया जाता है जिसे रंगपंचमी के नाम से भी जाना जाता है । यहां पर होली के मेले का आयोजन मुख्य रूप से ‘पड़ाव’ जगह पर होता है । इस दिन क्षेत्र के विधायक व प्रशासन अधिकारी मौजूद रहते हैं । इस दिन 12 गांवों के अलावा आसपास के गांवों से भी लोगों का तांता लगा रहता है । अच्छे से अच्छी मनोहर झांकियां निकाली जाती हैं साथ में पुरूस्कृत भी किया जाता है । रात्रि को स्वांग, रसियादंगल, डांस कॉम्पिटिशन इत्यादि तरह के मनोहारी खेल होते हैं ।

यह ब्रज के १२ वनों में से एक है। यहाँ श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ तर-तरह की लीलाएं करते थे। यहाँ पर खजूर के बहुत वृक्ष थे। यहाँ पर श्री कृष्ण गोचारण के समय सभी सखाओं के साथ पके हुए खजूर खाते थे।यहाँ खदीर के पेड़ होने के कारण भी इस गाँव का नाम ‘खदीरवन’ पड़ा है। खदीर (कत्था) पान का एक प्रकार का मसाला है। कृष्ण ने बकासुर को मारने के लिए खदेड़ा था। खदेड़ने के कारण भी इस गाँव का नाम ‘खदेड़वन’ या ‘खदीरवन’ है।

गांव का नाम भगवान कृष्ण के गौरवशाली इतिहास से भी जुड़ा हुआ है । यहाँ पर ब्रज के प्रसिद्ध वनों में एक खदिरवन भी यहीं स्थित है । इसी वन में कंस द्वारा भगवान कृष्ण को मारने के लिए भेजे गये बकासुर राक्षस का वध स्वयं बाल कृष्ण ठाकुर जी ने किया था । बकासुर एक बगुले का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को मारने के लिए इसी वन में पहुंचा था जहाँ कान्हा और सभी ग्वालबाल खेल रहे थे। तब बकासुर ने बगुले का रूप धारण कर कृष्ण को निगल लिया और कुछ ही देर बाद कान्हा ने उस बगुले की चौंच को चीरकर उसका वध कर दिया।

एक वृतांत के अनुसार उस समय बकासुर की भयंकर आकृति को देखकर समस्त सखा लोग डरकर बड़े ज़ोर से चिल्लाये ‘खायो रे ! खायो रे ! किन्तु कृष्ण ने निर्भीकता से अपने एक पैर से उसकी निचली चोंच को और एक हाथ से ऊपरी चोंच को पकड़कर उसको घास फूस की भाँति चीर दिया। सखा लोग बड़े उल्लासित हुए।
‘खायो रे ! खायो रे !’ इस लीला के कारण इस गाँव का नाम ‘खायारे’ पड़ा जो कालान्तर में ‘खायरा’ हो गया।

ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

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सौभरेयों (सौभरि ब्राह्मणों) के मन में कुछ इस तरह के प्रश्न जिनको जानने की जिज्ञासा होती है ।

 कुछ प्रश्न इस प्रकार हैं जिनके उत्तर पाने के लिए स्वसमाज (अंगिरसगोत्री सौभरि ब्राह्मण समाज) के लोग लालायित होते हैं ।अगर इन सर्व प्रश्नों व उलझनों का उपाय सिर्फ एक ही पुस्तक में है और वो है “सौभरि ब्राह्मण परिचय” ।

1-ब्रह्मा जी के 10 मानसपुत्रों में से एक मानसपुत्र जो कि गोत्रकार ऋषि के साथ-साथ ऋग्वेद के नवम मण्डल के द्रष्टा भी हैं उनका नाम बतायें जिनकी वंश परंपरा के अंतर्गत “सौभरेय ब्राह्मण समाज” आता है ?
2-ब्रह्मर्षि सौभरि जी के दादाश्री व भगवान कृष्ण के गुरुतुल्य महर्षि का नाम बताईये ?
3-ब्रह्मर्षि सौभरि जी के परदादाश्री महर्षि का नाम बताईये ?
4-ब्रह्मर्षि सौभरि जी के पिताश्री महर्षि का नाम बताईये ?
5-अंगिरस गोत्री सौभरि ब्राह्मण समाज के उपगोत्र कितने हैं, उनके नाम सहित वर्णन करिये ?
6-सौभरि ब्राह्मण समाज के सम्पूर्ण भारतवर्ष कितने गांव तथा किस-किस जगह स्थित हैं ?
7-ब्रह्मऋषि सौभरि जी के ससुर व उनके परवारीजनों का वर्णन करिये?
 8-महर्षि सौभरि जी को शरणागतवत्सल क्यों कहा जाता है?
 9-अंगिरसगोत्री गौसेवक व दाऊजी मंदिर के संस्थापक कल्याण देव जी के उपगोत्र का नाम लिखिए?
 10-ब्रजभाषा में रचित ‘भगवतीचरित’ के रचयिता सौभरेयवंशी महान संत का नाम लिखिए ?
 11-सौभरेय ब्राह्मण समाज के उपगोत्रों में सबसे ज्यादा जनसंख्या किस उपगोत्र की है ?
 12-सौभरेय ब्राह्मण समाज के उपगोत्रों में सबसे ज्यादा फैलाव किस उपगोत्र के स्वजनों का है ?
 13-सौभरि ब्राह्मण समाज की मातृभाषा व पुरोताही की भाषा कौनसी हैं ?
 14-सौभरि ब्राह्मण समाज के लोगों की संसद व राजधानी आप किसे कहेंगे ?
 15-सौभरि ब्राह्मण समाज की 10 सार्वजनिक विरासतों के नामों का उल्लेख करें ?
 16-महर्षि सौभरि जी तपस्थली कहाँ स्थित है ?
 17-प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी का आश्रम का स्थित है ?
 18-सती हरदेवी जी की पुण्यस्थली कहाँ स्थित है ?
 19-बकासुर नामक असुर का भगवान श्रीकृष्ण ने किस जगह संहार किया था ?
 20-दुनिया के रिकार्ड्स को गिनीज बुक में लिखते हैं ठीक उसी की तरह ही अपने समाज के कीर्तिमानों को किस पुस्तक में संजोया जाता है ?
 सौभरेय कीर्तिमान पुस्तक
 21-राजस्थान के 28 स्वजातीय सौभरेयजनों के गाँवों की राजधानी का नाम लिखें?
 22-यमुना के पश्चिम (आर) में स्थित 12 गाँवों की राजधानी के नाम से मशहूर व स्वसमाज के सबसे बड़े गांव का नाम लिखिए ?
23-अंगिरसगोत्री सौभरेय ब्राह्मण समाज के उपगोत्र के नाम पर किस गांव का नाम है ?
 24-सौभरेय ब्राह्मणों का मूल निवास स्थान कहाँ स्थित है ?
 25-मथुरा संग्रहालय में स्थित यक्ष व यक्षनी की मूर्तियां किस गाँव से खुदाई में प्राप्त हुईं ?
 26-सूर्य नारायण मंदिर व सूरजकुण्ड किस गाँव में स्थित हैं ?
 27-ब्रजमण्डल के 12 वनों में एक वन अपने किस स्वजातीय गाँव के अंतर्गत आता है ?
 28-रंगपंचमी को मनाये जाने वाली ब्रज की अंतिम होली किस गाँव में होती है?
29- होली के अवसर पर चैत्र शुक्ल द्वितीया को “ब्रज का हुरंगा” कहे जाने वाले पर्व को किस पावन स्थल पर मनाया जाता है ?
 30-प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की जन्मभूमि कहाँ स्थित है?
 31-स्वसमाज के सबसे पहले चयनित आईएएस अधिकारी का नाम बतायें ?
 32-स्वसमाज के लोग मूलरुप से किन-किन प्रांतों में रहते हैं ?
 33-सम्राट भरत जिनके नाम पर देश का नाम भारत पड़ा, वो किस ऋषि के आश्रम में पले- बढ़े?
 34-ब्रह्मर्षि सौभरि जी के कितने पुत्र हुए?
 35-वृन्दावन के निकट ब्रह्मऋषि सौभरि जी की तपस्थली व सौभरेय ब्राह्मण समाज का मूलनिवास गांव सुनरख से हुए पलायन क्या कारण था ?
 36-अंगिरसगोत्री सौभरेय ब्राह्मण समाज के उपगोत्र “भुर्रक” जनों का मूल निवास व निकास किस गांव से है ?
 37-स्वसमाज की आर्थिक व सामाजिक स्थिति किस प्रदेश व मंडल में सर्वोपरि है ?
 38-स्वसमाज के पहले व इकलौते छाता विधानसभा क्षेत्र के विधायक (MLA) किस गाँव के थे?
 39-स्वसमाज की सबसे बड़ी कार्यकरिणी “अखिल भारतीय सौभरेय ब्राह्मण संघ” का कार्यालय कहाँ स्थित है ?
 40-राजा मान्धाता के पुत्रों व महर्षि सौभरि जी के सालों (पत्नियों के भाइयों) का नाम लिखिए ?
41-महर्षि सौभरिजी ने यमुना जल के अन्दर कितने वर्षों तक मेडिटेशन किया?
 42-सम्पूर्ण ब्रज के मंदिरों में कृष्ण के अग्रज (बडे भाई) दाऊ बाबा का सबसे बड़ा ‘मूर्तिरूप’ बल्देवनगर के दाऊजी 43-मंदिर में स्थित कितने फ़ीट का है?
 44-बल्देव नगर स्थित दाऊजी की मूर्ति देवालय में कोनसे सन में प्रतिष्ठित हुई ?
 मार्गशीर्ष पूर्णिमा संवत 1639 AD.
 45-ब्रह्मऋषि सौभरि जी का जन्म किस तिथि को हुआ था?
 46-प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी का जन्म कब हुआ था ?
 सम्वत् 1942 (सन १८८५ ई०) की कार्तिक कृष्ण अष्टमी (अहोई आठें) को
 47-प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी किस सन में अपना देह छोड़ ब्रह्म में विलीन हो गए ?
 48-सम्वत् 2047 (सन 1990 ई०) की चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को भौतिक देह का त्याग वृन्दावन में कर गोलोकधाम प्रविष्ट हो गए।
 49-सन्‌ १९६७ में गो-हत्या के प्रश्न को लेकर उन्होंने कितने दिन तक उपवास रखा ?
 80 दिन
 50-शिवशक्ति हरदेवी जी ने किस सन में सतीत्व को प्राप्त किया?
 श्रावण शुक्ल अष्टमी 1980
 51-पातिव्रत्यधर्मी हरदेवी जी का मेला पलसों गाँव में किस सन से होना प्रारम्भ हुआ था ?
52- किन-किन वेदों व पुराणों में ब्रह्मर्षिअंगिरा जी, महर्षिघोर जी, कण्वऋषि और शरणागतवत्सल महर्षि सौभरि जी के जीवन का वर्णन मिलता है?
 52-सम्पूर्ण भारतवर्ष में आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के कुल मूल गांव कितने हैं?
 53-सम्पूर्ण भारतवर्ष में आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के कुल जनसंख्या अनुमानतः कितनी हैं?
 आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों का भारतवर्ष के इतिहास आदिकाल से अब तक क्या योगदान रहा है?


साभार:-
पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलाँ, गोवर्धन (मथुरा)


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ब्रह्मर्षि सौभरि ब्राह्मणों के उपगोत्रों का वर्णन

सौभरि ब्राह्मण समाज एक नज़र में

 गोत्र: अंगिरस

उपगोत्र: 5०

कुल स्वजाति जनसँख्या – २ लाख से ऊपर

सबसे बड़ा गांव: खायरा

भाषा- ब्रज (मूलभाषा ), संस्कृत, हिंदी, बुंदेली, अवधी, इंग्लिश

किन प्रदेशों में स्वसमाज क गांव पड़ते हैं : उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान

समाज के महान व्यक्तित्व: प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी, कलयाण देव जी,सती हरदेवी, मध्वाचार्य जी

सामाजिक धर्मशाला: गोवर्धन कुञ्ज

अखिल भारत में गांवों की दृष्टि से सामजिक फैलाव जिलेवार : २५ से ज्यादा

ब्रज के १२ वनों के अंतर्गत आने वाला वन- खदिरवन खायरा

गोस्वामी कल्याण देव जी:दाऊजी मंदिर के संस्थापक
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी: महानसंत व भगवती चरित के रचयिता (ब्रजभाषा )
सती हरदेवी जी : सतीत्व
माधवाचार्य जी : प्रोफ़ेसर व समाज रक्षक
सुनरख: ब्रह्मऋषि जी की तपस्थली {वृन्दावन }
गोवर्धन कुन्ज : हमारी संसद
सम्पूर्ण भारत में गांव : १६२ से ज्यादा 
दाऊजी की बगीची : वृन्दावन में शोध संस्थान के लिए दी गयी भूमि
अखिल भारतीय सौभरेय संगठन: (जन जन को जागरूक कराने में क्रांतिकारी योगदान)
दाऊजी मंदिर: (बलदेव )
सेवा कुन्ज: वृन्दावन
सती हरदेवी मंदिर :पलसौं(परशुराम खेरा )
खदिरवन : खायरा
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी आश्रम :झूसी (इलाहबाद )
बलदेव नगरी: राजधानी (पंडौं की नगरी )

ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

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सौभरि ब्राह्मणों का वृन्दावन से अन्यत्र पलायन

 वो काली रात जब, हुआ था हमारे पूर्वजों का बहिष्कार- वृन्दावन “सौभरि ब्राह्मण समाज” का मूल निवास रहा है(सुनरख धाम ) क्योंकि हमारे वंशधर “ब्रह्मऋषि सौभरि जी” व् पूर्वजौं की तपस्थली थी | लेकिन एक घटना है जिसको सुनते ही आज भी दिल कम्पित हो उठता है, शायद हमारी युवा पीढ़ी इस “वाक़या” से अनभिज्ञ होगी | हम उसको काला दिवस नही कह सकते लेकिन वो भयंकर काली रात रही होगी| जब हमारी पांडित्यपूर्ण पराकाष्ठा चरम पर थी और ब्रज के लगभग सभी बड़े देवालयों के पुरोहित थे तब अचानक ही एक ऐसी अनहोनी हुई जिसने हमको देश के कोने -कोने में जाने को मजबूर कर दिया | वो कुछ इस तरह से है-

सन १३०० ई० के करीब बस एक छोटी सी बात नामंजूर करने पर नबाब ने, यह कह कर सौभरि ब्राह्मण समाज का बहिष्कार कर दिया, कि आप सोने की भी गाय नही काट सकते, शहर वृन्दावन को खाली करने का फरमान जारी कर दिया | जितने भी जाति संसार के पूजनीय और कर्मनिष्ठ थे उनको चिंता सताने लगी | रातों रात सलाह मशविरा किया, निष्कर्ष निकाला कि “काटने ” से “भागना ” बेहतर है और उसी क्षण अपनी जान बचाने की खातिर और अपने ‘ब्राह्मणत्व कि गरिमा’ को ध्यान रखते हुए, चलते बने | उसी रात अपने बच्चों और सामान के साथ निकल लिए |अब इतनी बड़ी तादात, जाएं तो कहाँ जाएं, बुद्धजीवियों ने सोचा जिसको जहाँ-जहाँ जगह मिलती जाय वो वहीँ ठहर ते जाओ | फिर क्या था धीरे- धीरे रथों का टोला आगे बढ़ता गया और जिसको जैसी जगह मिली वह वहीँ बसता गया | इधर सैकड़ों परिवार हाथरस, अलीगढ और बरेली की तरफ निकल गए | उधर ये घटना भरतपुर नरेश को पता चला तो उसने अपने गुप्तचरो द्वारा कुछ ठिकाने दे दिए जहाँ वो रह सकें | इस तरीके से कबीलों की तरह बसते गए | कुछ लोगो को सुदूर भेज दिया गया | उस समय एक राज्य से दूसरे राज्य में घुसने के लिए अनुमति लेनी पड़ती थी|इसलिए कुछ राजा के द्वारा बतौर शरणार्थी, कुछ रात में सीमा लांघकर , परिवारों का जिम्मा भिंड मुरैना विरासतों ने संभाला और बाकि जबलपुर की तरफ बढ़ गए |
कितनी यातनायें झेलने के बाद आज हम फिर से समृद्धि की ओर हैं |
स्वजाति आबादी – ढाई लाख से ऊपर
संत, सती, हजारों इंजीनियर्स, टीचर्स, डॉक्टर्स , pwd ठेकेदार,स्वतंत्रता सेनानी, सैनिक,पुलिस , हजारो से ज्यादा भारत सरकार के कर्मचारी, और करीब प्राथमिक रोजगार ‘खेती’ से आया हुआ करोड़ों रुपयों का टर्नओवर के मध्ये नजर अपने आसपास के इलाकों में सम्रद्धि की धाक जमाये हुए हैं |
ऐसे कर्मनिष्ठ समाज को मेरा शत शत नमन …
: ओमन सौभरि (भरनाकलां )

ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

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सौभरि समाज के महान व्यक्तित्व

 सौभरि समाज के महान व्यक्तित्व-

1- गोस्वामी कल्याणदेव जी- 


बल्देव नगरी के संस्थापक कल्याण देव जी बड़ी ही धार्मिक और सेवा भाव वाले व्यक्ति थे । वे निष्काम भाव से ठाकुर सेवा व गोसेवा किया करते थे । उनका उपगोत्र 'तगारे' था । बाल्यावस्था बाद वो गोकुल आकर रहने लगे थे। एक ओर यह मुग़लों की स्थापना का समय था दूसरी ओर मध्ययुगीन धर्माचार्य एवं सन्तों के अवतरण तथा अभ्युदय का स्वर्णयुग। ब्रजमंडल में तत्कालीन धर्माचार्यों में महाप्रभु बल्लभाचार्य, श्री निम्बकाचार्य एवं चैतन्य संप्रदाय की मान्यताएं अत्यन्त लोकप्रिय थीं।

गोवर्धन की तलहटी में एक बहुत प्राचीनतीर्थ-स्थल सूर्यकुण्ड तटवर्तीग्राम भरना-खुर्द (छोटाभरना) था। इसी सूर्य कुण्ड के घाट पर परम सात्विक ब्राह्मण वंशावतंश गोस्वामी कल्याणदेवाचार्य तपस्या करते थे। उनका जन्म भी इसी ग्राम में अभयराम जी के घर में हुआ था। वे श्रीबलदेवजी के अनन्य अर्चक थे।


एक दिन श्री कल्याण-देवजी ने मथुरा तीर्थाटन का निश्चय कर घर से प्रस्थान कर दिया और श्री गिर्राज परिक्रमा कर के मानसी गंगा में स्नान किया इसके बाद फिर मथुरा नगरी पहुँचे, यहाँ श्री कल्याण देव जी ने श्री यमुना जी में स्नान किया और दर्शन कर आगे बढ़े और पहुँचे विद्रुमवन जहाँ आज का वर्तमान बल्देव नगर है। यहाँ रात्रि विश्राम किया। सघन वट-वृक्षों की छाया तथा यमुना जी का किनारा ये दोनों स्थितियाँ उनको भा गई। फलत: कुछ दिन यहीं तप करने का निश्चय किया।

एक दिन अपने नित्य कर्म से निवृत हुये ही थे कि दिव्य हल मूसलधारी भगवान श्री बलराम उनके सम्मुख प्रकट हुये तथा बोले कि मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, वर माँगो। कल्याण देवजी ने करबद्ध प्रणाम कर निवेदन किया कि प्रभु आपके नित्य दर्शन के अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। अत: आप नित्य मेरे घर विराजें। बलदेवजी ने तथास्तु कहकर स्वीकृति दी और अन्तर्धान हो गये। साथ ही यह भी आदेश किया कि ‘जिस प्रयोजन हेतु मथुरा यात्रा कर रहे हो, वे सभी फल तुम्हें यहीं मिलेंगे । श्री दाउजी महाराज ने श्री कल्याण देवजी को बताया की, इसी वट-वृक्ष के नीचे मेरी एवं श्री रेवती जी की प्रतिमाएं भूमिस्थ हैं, उनका प्राकट्य करो। अब तो कल्याण-देवजी की व्यग्रता बढ गई और जुट गये भूमि के खोदने में, जिस स्थान का आदेश श्री बलराम, दाऊ जी ने किया था।

इधर एक और विचित्र आख्यान गोकुल उपस्थित हुआ कि जिस दिन श्री कल्याण-देवजी को साक्षात्कार हुआ उसी पूर्व रात्रि को गोकुल में गोस्वामी गोकुलनाथजी को स्वप्न आया कि जो श्यामा गौ (गाय) के बारे में आप चिन्तित हैं वह नित्य दूध मेरी प्रतिमा के ऊपर स्त्रवित कर देती है और जिस ग्वाले को आप दोषी मान रहे हो वो निर्दोष है। मेरी प्रतिमाएं विद्रुमवन में वट-वृक्ष के नीचे भूमिस्थ हैं उनको प्राकट्य कराओ।

यह श्यामा गौ सद्य प्रसूता होने के बावजूद दूध नहीं देती थी क्यूँकि ग्वाला जब सभी गायों को लेकर वन में चराने ले जाते थे तभी ये श्यामा गाय, एक अमुख स्थान पर जा खड़ी हो जाती थी और श्यामा गाय के थनों से स्वतः दूध उस स्थान पर गिरने लगता था जहाँ पर श्री दाउजी और रेवती माया की मूर्तियाँ भूमिस्थ थीं इस वजह से गाय के थनों में दूध नही होता था। इसी कारण महाराज श्री को दूध के बारे में ग्वाला के ऊपर सन्देह होता था। प्रभु की आज्ञा से गोस्वामीजी ने उपर्युक्त स्थल पर जाने का निर्णय किया। वहाँ जाकर देखा कि श्री कल्याण देवजी मूर्तियुगल को भूमि से खोदकर निकाल चुके हैं। वहाँ पहुँच नमस्कार अभिवादन के उपरान्त दोनों ने अपने-अपने वृतान्त सुनाये और निश्चय किया कि इस घोर जंगल से मूर्तिद्वय को हटाकर क्यों न श्री गोकुल में प्रतिष्ठित किया जाय। कहते हैं कि चौबीस बैल और अनेक व्यक्तियों के द्वारा हटाये जाने पर भी, मूर्तिया टस से मस न हुई और इतना श्रम व्यर्थ गया। हार मानकर सभी यही निश्चय किया गया कि दोनों मूर्तियों को अपने प्राकट्य के स्थान पर ही प्रतिष्ठित कर दिया जाय। अत: जहाँ श्रीकल्याण-देव तपस्या करते थे उसी पर्णकुटी में सर्वप्रथम स्थापना हुई जिसके द्वारा कल्याण देवजी को नित्य घर में निवास करने का दिया गया ।

यह दिन संयोगत: मार्गशीर्ष मास की पूर्णमासी थी। षोडसोपचार क्रम से वेदाचार के अनुरूप दोनों मूर्तियों की अर्चना की गई तथा सर्वप्रथम श्री ठाकुरजी को खीर का भोग रखा गया, अत: उस दिन से लेकर आज तक प्रतिदिन खीर भोग में अवश्य आती है। गोस्वामी गोकुलनाथजी ने एक नवीन मंदिर के निर्माण का भार वहन करने का संकल्प लिया तथा पूजा अर्चना का भार श्रीकल्याण-देवजी ने। उस दिन से अद्यावधि तक श्रीकल्याण वंशज ही श्री ठाकुरजी की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। यह दिन मार्ग शीर्ष पूर्णिमा सम्वत् 1638 विक्रम था। एक वर्ष के भीतर पुन: दोनों मूर्तियों को पर्णकुटी से हटाकर श्री गोस्वामी महाराज श्री के नव-निर्मित देवालय में, जो कि सम्पूर्ण सुविधाओं से युक्त था, मार्ग शीर्ष पूर्णिमा संवत 1639 को प्रतिष्ठित कर दिया गया। यह स्थान भगवान बलराम की जन्म-स्थली एवं नित्य क्रीड़ा स्थली है पौराणिक आख्यान के अनुसार यह स्थान नन्द बाबा के अधिकार क्षेत्र में था।

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2- स्वामी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी-


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संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी संस्कृत, हिंदी, ब्रजभाषा के प्रकाण्ड विद्वान तथा आध्यात्म के पुरोधा थे।
वे ‘ श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव ‘ मंत्र के द्रष्टा थे
उनके जीवन के चार संकल्प थे – दिल्ली में हनुमान जी की ४० फुट ऊंची प्रतिमा की स्थापना, राजधानी स्थित पांडवों के किले (इन्द्रप्रस्थ) में भगवान विष्णु की ६० फुट ऊंची प्रतिमा की स्थापना, गोहत्या पर प्रतिबंध तथा श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति।
संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का जन्म जनपद अलीगढ के ग्राम अहिवासीनगला में सम्वत् 1942 (सन १८८५ ई०) की कार्तिक कृष्ण अष्टमी (अहोई आठें) को परम भागवत पं॰ मेवाराम जी के पुत्र रूप में हुआ। विदुषी माता अयुध्यादेवी से संत सुलभ संस्कार प्राप्त कर आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। सम्वत् 2047 (सन 1990 ई०) की चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को भौतिक देह का त्याग वृन्दावन में कर गोलोकधाम प्रविष्ट हो गए।
अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया। फलस्वरूप उन्हें कठोर कारावास का दण्डश् भोगना पड़ा। भारत के स्वतंत्र होने पर राजनेताओं की विचारधारा से दु:खी होकर सदा के लिए राजनीति से अलग हो गए और झूसी में हंसस्कूल नामक स्थान पर वटवृक्ष के नीचे तप करने लगे। गायत्री महामंत्र का जप किया। वैराग्य भाव से हिमालय की ओर भी गए और फिर वृन्दावन आकर रहे।
श्री महाराज ब्रजभाषा के सिद्धहस्त कवि थे। उन्होंने सम्पूर्ण भागवत को महाकाव्य के रूप में छन्दों में लिखा था। “भागवत चरित‘ कोश्” ब्रजभाषा में लिखने का एकमात्र श्रेय श्री
स्वतंत्र भारत में गो-हत्या होते देखकर ब्रह्मचारी जी को बहुत दु:ख हुआ। गो-हत्या निरोध समिति बनायी गई, उसके वे अध्यक्ष बने। सन्‌ १९६०-६१ में कश्मीर से कन्याकुमारी तक उन्होंने कई बार भ्रमण किया। सन्‌ १९६७ में गो-हत्या के प्रश्न को लेकर उन्होंने ८० दिन तक ्व्रात किया और सरकार के विशेष आग्रह पर अपना व्रत भंग किया। वे रा. स्व. संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के भी निकट रहे। इसी बीच पं॰ जवाहरलाल नेहरू जब हिन्दू समाज विरोधी “हिन्दू कोड बिल’ लाए, तो मित्रों के प्रोत्साहन से ब्रह्मचारी जी चुनाव में खड़े हुए। आखिर नेहरू जी को हिन्दू कोड बिल को वापस लेना पड़ा। दक्षिण भारत की यात्रा के समय उन्होंने एक स्थान पर २६ फुट की हनुमान जी की प्रतिमा देखी तो वैसी ही एक विशालकाय प्रतिमा बनवाने का और उसे दिल्ली के आश्रम में दिल्ली के कोतवाल के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिया। ब्रह्मचारी जी भारतीय संस्कृति के स्तम्भ रहे। भारतीय संस्कृति व शुद्धि, महाभारत के प्राण महात्मा कर्ण, गोपालन, शिक्षा, बद्रीनाथ दर्शन, मुक्तिनाथ दर्शन, महावीर हनुमान जैसे उदात्त साहित्य की रचना की। ब्रह्मचारी जी द्वारा दिल्ली, वृन्दावन, बद्रीनाथ और प्रयाग में स्थापित संकीर्तन भवन के नाम से चार आश्रम आज भी सुचारू रूप से चल रहे हैं।
उनका संकीर्तन में अटूट लगाव था। वृन्दावन में यमुना के तट पर वंशीवट के निकट संकीर्तन भवन की स्थापना की तो प्रयाग राज प्रतिष्ठानपुर झूसीमें अनेकानेक प्रकल्पों के साथ संकीर्तन भवन प्रतिष्ठित किया।
एक बार गोरक्षाके प्रकरण पर वे वृंदावन में शासन के विरुद्घ आमरण अनशन पर बैठ गए। देश के लाखों लोग उनके साथ हो लिए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आग्रह एवं आश्वासन पर ही उन्होंने रस-पान किया था
स्वाधीनता आंदोलन में वे पं.जवाहरलाल नेहरू के साथ जेल में रहे थे। स्वाधीनता संग्राम काल में उनकी पत्रकारिता बेजोड थी। उन्होंने कई पन्नों का संपादन तथा प्रकाशन किया एवं सदैव खादी का प्रयोग किया। पूज्य ब्रह्मचारी जी ने अपने कर्म, धर्म, आचरण एवं लेखनी के द्वारा समाज को जो कुछ भी दिया वह लौकिक परिवेश में अलौकिक ही है। वे आशु कवि थे। श्रीमद्भागवत, गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि अत्यंत दुरूह ग्रंथों की सरल सुबोध हिंदी में व्याख्या कर भक्तवर गोस्वामी तुलसीदास के अनुरूप जनकल्याण कार्य किया। उन्होंने श्री भागवत को 118 भागों में जन सामान्य की सरल भाषा में प्रस्तुत किया। उनके रचित ब्रजभाषा के सुललित छन्द (छप्पय) बोधगम्यएवं गेय है, जिनका आज भी स्थान-स्थान पर वाद्य-वृंद संगति के साथ पारायण कर लोग आनंदित होते हैं। इनके अतिरिक्त नाम संकीर्तन महिमा, शुक (नाटक), भागवत कथा की वानगी, भारतीय संस्कृति एवं शुद्धि, वृंदावन माहात्म्य, राघवेंद्र चरित्र, प्रभु पूजा पद्धति, कृष्ण चरित्र, रासपंचाध्यायी, गोपीगीत, प्रभुपदावली, चैतन्य चरितावली आदि लगभग 100 अन्य आध्यात्मिक ग्रंथों का प्रणयन किया।

श्रीश्रीचैतन्य-चरितावली (SHRI-SHRI-CHAITANYA-CHARITAVALI)- प्रस्तुत पुस्तक में मात्र चार सौ वर्ष पूर्व बंगाल में भक्ति और प्रेम की अजस्र धारा प्रवाहित करने वाले कलिपावनावतार श्री चैतन्य महाप्रभु का विस्तृत जीवन-परिचय है। स्वनामधन्य परम संत श्री प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी द्वारा प्रणीत यह ग्रन्थ श्री चैतन्य देव के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र की सुन्दर परिक्रमा है।
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा रचित ब्रजभाषा के सुललित छन्द (छप्पय) बोधगम्य एवं गेय है, जिनका आज भी स्थान-स्थान पर वाद्य-वृंद संगति के साथ पारायण कर लोग आनंदित होते हैं।

निधन- संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने संवत 2047 (1990 ई.) के चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को भौतिक देह का त्याग प्रसिद्ध धार्मिक नगरी वृन्दावन, मथुरा में किया।

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3- शिवशक्ति माँ सती हरदेवी – 

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सती अनुसूइया और माता सीता जैसा पतिव्रतधर्मी होना कलयुग में अत्यंत दुर्लभ है, यदि कोई है भी तो इनकी शक्ति उन्हीं के समतुल्य है । हमारे देश में सतीत्व को आदिकाल से ही स्त्री का आभूषण माना जाता रहा है ।

भारत भूमि पर चमत्कार पर चमत्कार अनादि कल से ही होते आये हैं,जिसमें ब्रजभूमि का स्थान अग्रिम रहा है |
बात सन 1980 की हैं जब एक हूबहू चमत्कार हुआ था | इतना बड़ा आँखों देखा चमत्कार, शायद देश की आजादी बाद हुआ हो | ब्रज मंडल के जिला- मथुरा,तहसील -गोवर्धन थाना -बरसाना गांव-पलसों (परशुराम खेड़ा ) में एक दिव्यांगना, ‘जिनका नाम शिव शक्ति हरदेवी जी’ ने स्वयं माँ पार्वती के रूप की झलक, साधारण नर- नारियों के बीच दिखाई | वाक़या कुछ इस तरीके से है –

गांव खायरा (बरसाना के पास ) में एक ‘सौभरि ब्राह्मण’ परिवार में जन्म लिया | बचपन से ही पूजा भावना में बड़ी लग्न थी |एक साधारण परिवार में जन्म लेते हुए और अपनी साधारण छबि को दर्शाते हुए, अपने मायके में ये खबर न होने दी की कोई दिव्यशक्ति का आगमन हुआ है |धीरे धीरे समय बीतता गया और शादी लायक हुई तो घर वालो ने वर ढूढ़ना प्रारम्भ किया और इस तरीके से ग्राम पलसों में से वर का चयन कर दिया गया |शादी होने के बाद दो बच्चे और २ बच्चियां हुई और जिंदगी सब ठीक ठाक चल रही थी| समय बीतते -बीतते उनके पति जी के महामारी हो गयी अचानक उनके जीवन ने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया, मानो मुसीबतो का पहाड़ टूट पड़ा हो |उपचार कराने बाद भी वे शौहर को ना बचा सकीं |जब की अंतिम संस्कार बारी आयी तो माँ हरदेवी जी मृत शरीर को अपने गोदी में रख कर अंतिम संस्कार के लिए जाने पर अपने सती होने का मनोभाव जताने लगीं |लेकिन ये बात किसी ने स्वीकार नही की क्योंकि ‘अभी बच्चे भी छोटे छोटे हैं’ इनकी तरफ भी तो देख लो, इस तरह आसपास के लोगो ने समझाया |लेकिन वो मानने को तैयार नही हुई और अपनी अंतिम यात्रा का भूत, सभी के सामने पेश कर दिया की मैं अपने पति संग सती होउंगी |ये सुनकर सब सन्न रह गए और कोहराम बढ़ गया |लेकिन जैसे-तैसे मृत शरीर को श्मशान तक ले गए और दाह संस्कार किया |लेकिन ऊपर धड़ वाला हिस्सा जला ही नही क्योंकि जिस जगह शिवशक्ति हरदेवी जी के हाथों का स्पर्श हुआ वहाँ से वो भाग बिना जले रह गया |लोगो ने खूब जलाने की कोशिश की पर सब नाकामयाब |आखिर उस हिस्से को गंगा में विसर्जन करने के लिए लोगो ने सुझाया |उधर हरदेवी जी का मन पूरी तरह से विरक्त हो चूका था और माने नही मान रही थी |उनके इस अवस्था को देखकर जिला चिकित्सालय को ले गए |वहाँ भी वही खुमार, न कोई दवा काम करे और न ही कोई सुझाव |घटना धीरे-धीरे विकराल रूप लेता जा रही थी |जिले के बड़े-बड़े अधिकारी आ चुके थे उनके कुछ समझ नही आ रहा था | उधर गंगा गए लोगों की तरफ से सूचनाएं आती हैं कि वो “ना जला हुआ हिस्सा” बार बार गंगा के तट कि ओर आ जाता है और पानी के साथ नही बह रहा है | तो लोगों को और प्रशाशन को विश्वास हो गया कि कोई ना कोई चमत्कार तो है और उस हिस्से को बापस लाने को बोल दिया गया | | लेकिन ये भी था कि भारत में सती प्रथा का चलन बंद और गैरकानूनी हो गया था तब उस समय इस घटना के विरुद्ध प्रशाशन भी आने लगा | अंत प्रशाशन को झुकना पड़ा और हरदेवी जी को बापस पलसों गांव लेकर आगये |
गांव के निकट एक मंदिर था उसमें उन्होंने अपना ध्यान लगाया,उसी समय वही पर एक बाबा आये जो बिलकुल अजनबी थे उन्होंने हरदेवी जी को सती होने की रीति रिवाज से वाकिफ कराया | और थोड़े समय बाद ही वहाँ से अंतरध्यान हो गए |उनको साक्षात् शिव का रूप बताते हैं | फिर तो उसके बाद हरदेवी जी ने पूरी तरह श्रृंगारयुक्त होकर अपने पति के उस भाग को लेकर उसी जगह जहाँ उनके शौहर कि चिता थी वही समाधि लगाकर बैठ गयी | ये सारा कोतुहल, वहाँ के और दूर -दूर से आये हुए लोग और साथ में पुलिस प्रशाशन भी, देख रहे थेे और इस घटना के गवाह बन रहे थे | वहाँ खड़ी भीड़ से वो कुछ कहना चाह रही थी लेकिन लोग सब जय जयकार के नारे लगाने कि वजह से सुन नही पाए | देखते ही देखते अपने दोनों हाथों को रगड़ते हुए अग्नि उत्पन्न की और अग्नि धीरे -धीरे नीचे से पूरे हिस्से में पहुँचने लगी |पल भर बाद उनके बैठने की स्थिति बिचलित हुई लोगों ने बांस के सहारे उसी स्थिति में लाने की सोचते, ‘कहीं उस से पहले ही’ वह यथावत हो गयीं | फिर इसके बाद लोगों ने घी डालना शुरू कर दिया, जयकारों से सारा क्षेत्र गूंजने लगा |जिसने भी सुना वह उसी स्थिति में भाग भाग के वहाँ पहुँचने लगे | और जिस समय ये घटना हो रही थी उसी समय वहाँ जगह-जगह ” केसर” की वर्षा हुई | साक्षी बताते हैं की उस समाधि वाली जगह पर कई महीनों तक अग्नि की लौह जलती रही | आज वहीँ पर उनकी समाधि बनी हुई है और मंदिर भी | वो जगह पूजनीय हो गई वहाँ बाहर से बड़ी दूर -दूर लोग आज भी मथ्था टेकने आते हैं सन २०१२ से श्रावण मास की अष्टमी को एक मेले का आयोजन होता है | उसका जिम्मा पूरे ग्रामवासी उठाते हैं | कलियुग में चमत्कार करने वाली ऐसी मातृशक्ति, शिवशक्ति को कोटि कोटि नमन करता हूं |

4- माधवाचार्य जी- 


  ब्रिटिशराज में मंदिर को इसके साथ ही एक धक्का तब लगा जब ग्राउस मथुरा का कलेक्टर नियुक्त हुआ। ग्राउस  का विचार था कि बलदेव जैसे प्रभावशाली स्थान पर एक चर्च का निर्माण कराया जाय क्योंकि बलदेव उस समय एक मूर्धन्य तीर्थ स्थल था। अत: उसने मंदिर की बिना आज्ञा के चर्च निर्माण प्रारम्भ कर दिया। शाही जमाने से ही मंदिर की 256 एकड़ भूमि में मंदिर की आज्ञा के बगैर कोई व्यक्ति किसी प्रकार का निर्माण नहीं करा सकता था क्योंकि उपर्युक्त भूमि के मालिक जमींदार श्री दाऊजी हैं तो उनकी आज्ञा के बिना कोई निर्माण कैसे हो सकता था? परन्तु उन्मादी ग्राउस ने बिना कोई परवाह किये निर्माण कराना शुरू कर दिया।


 मंदिर के मालिकान श्री दाउजी जी महाराज की कृपा से उसे बलपूर्वक ध्वस्त करा दिया जिससे चिढ़-कर ग्राउस ने पंडावर्ग एवं अन्य निवासियों को भारी आतंकित किया ग्राउस ने हमारे समाज को निम्न श्रेणी में डाल दिया था

मंदिर मालिकान ने आगरा के एक मूर्धन्य सेठ एवं महाराज मुरसान के व्यक्तिगत प्रभाव का प्रयोग कर वायसराय से भेंट की और ग्राउस का स्थानान्तरण बुलन्दशहर कराया । जिस स्थान पर चर्च का निर्माण कराने की ग्राउस की हठ थीं उसी स्थान पर आज वहाँ बेसिक प्राइमरी पाठशाला है जो पश्चिमी स्कूल के नाम से जानी जाती है यह ग्राउस की पराजय का मूक साक्षी है।
  उसी ग्राउस के किये हुए कुकृत्य के विरुद्ध अपना गौरव पुनः प्राप्त करने के लिए विद्वान व स्वसमाज के शुभचिंतक श्री माधवाचार्य जी ने माननीय सुप्रीमकोर्ट में जाकर चुनौती दी थी और साक्ष्य दिये और अंत में अपने स्वसमाज की विजय हुई।
 ब्राह्मणत्व को बरकरार रखते हुए ग्राउस का विरोध किया क्योंकि ग्राउस ने जनरल कैटगरी से समाज को  सिड्यूल कास्ट में डालने की भरसक कोशिश की लेकिन इस के लिए माधवाचार्य जी ने अभूतपूर्व, अतुलनीय व प्रशंशनीय काम किया और समाज को जनरल कैटेगिरी में बने रहने के लिए अड़े रहे, उनके योगदान को स्वसमाज कभी भुला नहीं पायेगा ।
स्वसमाज को फिर से सामान्य कैटेगिरी में लाने में इस महान विभूति ने बडे ही गौरव का काम किया । ऐसे स्वसमाज के व्यक्तित्व को हृदय से हाथ जोड़कर नमन करता हूँ ।

5-प्रसिद्ध चित्रकार पं. जगन्नाथ मुरलीधर अहिवासी:-
इनका जन्म 1901 में ब्रज मंडल के पवित्र स्थल गोकुल में प्रतिष्ठित आदिगौड़ अहिवासी ब्राह्मण  परिवार में हुआ था । इनके पिता पं. मुरलीधर अहिवासी अपने समय के प्रसिद्ध कथावाचक एवं भजनगायक थे ।

1926 में आपने जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स, मुंबई से चित्रकला मे शिक्षा प्राप्त की । इसके बाद इसी संस्था में आपको शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। 1956 में सेवानिवृत्त होने तक आप इस संस्था में चित्रकारी विभाग के प्रमुख रहे । 1935 में आपको 'जी. सुलोमोन पदक' से सम्मानित किया गया था । भारतीय चित्रकला में आपके उल्लेखनीय कार्य के लिए "ललित कला अकादमी नई दिल्ली" ने आपको स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था।

चित्रकला पर आपने पुस्तक भी लिखी जिनमें "रेखांजली" प्रमुख है, इस पुस्तक को  बी.जी. नवलखी द्वारा 1961 में  प्रकाशित किया गया। आपने नई दिल्ली, सचिवालय में भी भित्तिचित्र निष्पादित किये तथा आधुनिक भारतीय कला में आपके योगदान के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आपकी बहुत प्रशंसा की थी ।

आपके द्वारा बनाए गए चित्र विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित है, जिनमे जहाँगीर आर्ट गैलेरी, बॉम्बे और लन्दन, अमेरिका  की आर्ट गैलेरी प्रमुख हैं । 1941 में बच्चों के खेल विषय पर भारतीय समकालीन शैली में आपने  केवल स्याही का प्रयोग कर कलाकृति बनाई थी जिसका शीर्षक था "चूहा और बिल्ली" जो कि बॉम्बे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स के संग्रह में उपलब्ध है ।

आपकी कुछ प्रसिद्ध कृतियों में  " संदेश ", "सुभद्रा और अर्जुन ", "मीरा का प्रस्थान " आदि प्रमुख  है जो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने चीन के प्रधानमंत्री चाउ. एन. लाइ को उनकी भारत यात्रा के अवसर पर भेंट की थी । 1956 से 1970 तक आप  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में "ललित कला विभाग" में प्रशिक्षक तथा भारत कला भवन के प्रबंधक रहे ।

आपने 29 दिसम्बर 1973 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थित अपने ही निवास स्थल पर आपने इस धरती लोक को छोड़ परमधाम को गमन किया। लम्बे कद, गौर वर्ण, सरल स्वभाव, सदा हँसमुख चेहरा, अपने छात्रों के बीच लोकप्रिय और सदा चित्रकारिता में व्यस्त रहना, ये आपकी विशेषता रही ।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित दृश्य कला संकाय में दो नई कला दीर्घाओं दीर्घाएं जिसमें पहली महामना मालवीय व दूसरी संकाय के पहले पं. आचार्य जगन्नाथ मुरलीधर अहिवासी के नाम से खोली गई हैं।



:ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

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